यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध बारहवां अध्याय
बनाने की कृपा कीजिए. आप बारबार पाप से बचाने की कृपा कीजिए. ( ९ )
सह रय्या निवर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (१०)
हे अग्नि! आप धन के साथ पधारिए. आप पृथ्वी को जलधार से सींचिए. यह
जलधार प्यास बुझाने वाली है. आप पूरे संसार को इस से सींचिए. ( १० )
आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलि:.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्.. (११)
हे अग्नि! हम ने आप को आमंत्रित किया है. आप उखा के भीतर स्थित व ध्रुव
( स्थिर ) होइए. आप अविचल हो कर रहिए. सभी आप को चाहें. यज्ञ की कृपा से
पूरा राष्ट्र भ्रष्ट ( और कलंकित ) होने से बचे. ( ११ )
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ँ४ श्रथाय.
अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (१२)
हे वरुण! आप हमारे ऊपर, बीच व नीचे के बंधन दूर कीजिए. आप अदिति
के पुत्र हैं. हम अदिति के प्रति अनागस हो जाएं. ( १२ )
अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्जगन्वान् तमसो ज्योतिषागात्.
अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग ऽ आ जातो विश्वा सद्मान्यप्रा:... (१३)
अग्नि विशाल, प्रज्वलित, ऊषा के आगे स्थित और अंधकार से ज्योति की
ओर जाते हैं. वे सूर्य के साथ सामने प्रकटे. वे अंधकार नाशक के साथ प्रकटे.
उन्होंने उत्पन्न होते ही सभी लोकलोकांतरों को व्याप्त कर लिया. ( १३ )
ह ँ४ स: शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसद्दृतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (१४)
अग्नि गमनशील, पवित्र स्थान में रहने वाले, धनवर्षक. वे सब को बसाने वाले
व अंतरिक्ष में होने वाले हैं. वे देवों के आह्वाहक हैं. वे वेदी में स्थित रहने वाले,
अतिथि, सर्वत्र पूज्य हैं. वे यज्ञगृह में रहने वाले हैं. वे मनुष्यों में प्राण के रूप में रहते
हैं. वे व्योमवासी हैं और चिनगारी से उत्पन्न हैं. वे ऋत और पत्थर से उत्पन्न हैं. वे
विशाल हैं. ( १४ )
सीद त्वं मातुरस्या ऽ उपस्थे विश्वान्यग्ने वयुनानि विद्वान्.
मैनां तपसा मार्चिषाभि शोचीरन्तरस्या ँ४ शुक्रज्योतिर्विभाहि.. (१५)
हे अग्नि! माता की गोद में बैठने की तरह आप इस आसन पर विराजिए. आप
सर्वज्ञ और विद्वान् हैं. आप अपने ताप से इस मचिया को मत तपाइए. आप अपनी
भीतरी ज्योति से हमेशा चमकिए. ( १५ )
१४२ - यजुर्वेद