यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
यदग्ने कानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि.
सर्वं तदस्तु ते घृतं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (७३)
हे अग्नि! आप को कौनकौन सी लकड़ियां ( समिधा ) समर्पित की जाएं.
हे अग्नि! आप उन सभी को घी की आहुति की तरह अत्यंत प्रिय भाव से ग्रहण
करने की कृपा करें. ( ७३ )
यदत्त्युपजिह्विका यद्वम्रो अतिसर्पति.
सर्वं तदस्तु ते घृतं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (७४)
हे अग्नि! जैसे दीमक लकड़ी को खा जाती है, वैसे आप उसे खा जाएं. जैसे
घुन लकड़ी को खा जाता है, वैसे ही आप उसे खा जाएं. हे अग्नि! समिधाएं आप
को घी की तरह प्रिय हों. आप यज्ञ में उन सब को अत्यंत प्रिय भाव से ग्रहण करने
की कृपा करें. ( ७४ )
अहरहरप्रयावं भरन्तोश्वायेव तिष्ठते घासमस्मै.
रायस्पोषेण समिषा मदन्तोग्ने मा ते प्रतिवेशा रिषाम.. (७५)
हे अग्नि! जैसे घुड़साल में हर दिन घोड़े को घास प्रदान करते हैं तथा ( घास
से ) उस का भरणपोषण करते हैं, वैसे ही हम यजमान आप के संरक्षण में रहते हैं.
आप वैसे ही धन से हमारा पोषण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए हर
दिन समिधाओं का आहार भेंट करें. हम आप की कृपा से कभी भी दुःखी न हों.
सब प्रकार के सुख प्राप्त करें. ( ७५ )
नाभा पृथिव्याः समिधाने अग्नौ रायस्पोषाय बृहते हवामहे.
इरम्मदं बृहदुक्थं यजत्रं जेतारमग्निं पृतनासु सासहिम्.. (७६)
हे अग्नि! आप पृथ्व़ी की नाभि हैं. आप समिधा रूपी धन से पोषण पाते हैं.
हम विशाल अग्नि का बारबार आह्वान करते हैं. हम बड़ी ( लंबी ) स्तुतियों से आप
की प्रशंसा करते हैं. हम यहां विजेता अग्नि का आह्वान करते हैं. हम साहसी विजेता
अग्नि का आह्वान करते हैं. हम यहां ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु अग्नि का आह्वान करते
हैं. ( ७६ )
याः सेना ऽ अभीत्वरीराव्याधिनीरुगणा ऽ उत.
ये स्तेना ये च तस्करास्ताँस्ते अग्नेपि दधाम्यास्ये.. (७७)
हे अग्नि! शत्रुओं की जो सेना युद्ध हेतु तैयार होती है, उसे आप रोगों के
मुख में झोंक देते हैं. शत्रुओं की जो सेना युद्ध हेतु तैयार होती, उसे चोर डाकुओं
के मुख में झोंक देते हैं. हे अग्नि! हम आप को इसी उद्देश्य के लिए धारण
करते हैं. ( ७७ )
१३८ - यजुर्वेद