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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 421 में से

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पृष्ठ 131

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
का मूल स्थान हैं. आप देवताओं को देवताओं की तरह हवि से तृप्त करने वाले हैं.
आप यज्ञ संपन्न करने की कृपा करें. आप यजमान हेतु धन धारण व आयु धारें. ( ३५ )
नि होता होतृषदने विदानस्त्वे्षो दीदिवाँ २ असदत्सुदक्षः.
अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः.. (३६)
हमारे होता अग्नि होता सदन में शोभते हैं. अग्नि विद्वान्, तेजस्वी, दिव्य व
दिव्य स्थान वासी हैं. वे हजारों का पालनपोषण करने वाले, व्रतशील, अत्यंत पावन
व पवित्र जिह्वा वाले हैं. ( ३६ )
स ष्४ सीदस्व महाँ २ असि शोचस्व देववीतमः.
वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (३७)
हे अग्नि! आप प्रशंसित, महान्, पवित्र व दिव्य गुणों से संपन्न हैं. आप बहुत
सा लाल धुआं फैला कर मार्ग प्रशस्त करने की कृपा कीजिए. ( ३७ )
अपो देवीरुपसृज मधुमतीरयक्ष्माय प्रजाभ्यः.
तासामास्थानादुज्जिहतामोषधयः सुपिप्पलाः.. (३८)
हे अग्नि! आप दिव्य जल व प्रजा के लिए मीठी जलधारा उत्पन्न कीजिए. उन
जलधाराओं से रोग नाशक श्रेष्ठ ओषधियां उपजाने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
सन्ते वायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्.
यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मै देव वषडस्तु तुभ्यम्.. (३९)
हे पृथ्वी! आप विशाल हृदय हैं. आप जल व वनस्पति धारण कीजिए. आप देवों
में प्राणों का संचार करती हैं. आप किस देव के प्रति कल्याणदायी नहीं हैं. ( ३९ )
सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः.
वासो अग्ने विश्वरूप ष्४ सं व्ययस्व विभावसो.. (४०)
हे अग्नि! आप अच्छी तरह उत्पन्न होने वाले हैं. आप ज्वालाओं के साथ वेदी
को शोभित करने की कृपा कीजिए. आप सुखद व विभावान ( कांतिमान ) हैं. आप
विश्व रूप वाली पृथ्वी पर वास करते हैं. ( ४० )
उदु तिष्ठ स्वध्वरावा नो देव्या धिया.
दृशे च भासा बृहता सुशुक्वनिराग्ने याहि सुशस्तिभिः.. (४१)
हे अग्नि! आप उठिए, ( वेदी पर ) विराजिए और यज्ञ को संपादित कीजिए.
आप अपनी दिव्य बुद्धि से हमारा संरक्षण करने की कृपा कीजिए. आप अपनी
विशाल किरणों से पधारिए व दर्शन दीजिए. हम अच्छी प्रशंसात्मक स्तुतियों से
आप का आह्वान करते हैं. ( ४१ )
यजुर्वेद - १३१