यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध दसवां अध्याय
स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. ऐश्वर्यवान मित्र देव और वरुण देव ( इस
यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. व्रतधारी पूषा देव ( इस यज्ञ स्थल
की ) रक्षा करने की कृपा करें. समस्त देव ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की
कृपा करें. स्वर्गलोक ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. पृथ्वी देवी
विश्व का शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें.
सुखदायी अदिति माता शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की
कृपा करें. ( ९ )
अवेष्टा दन्दशूकाः प्राचीमारोह गायत्री त्वावतु रथन्तर १७ साम त्रिवृत्स्तोमो वसन्त ऽ
ऋतुर्ब्रह्म द्रविणम्.. (१०)
यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले जीवजंतु नष्ट हो गए. आप पूर्व दिशा में आरोहण
करने की कृपा कीजिए. गायत्री, रथंतर सोम व वसंत ऋतु आप की रक्षा करने की
कृपा करें. ब्रह्म धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १० )
दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वावतु बृहत्साम पञ्चदश स्तोमो ग्रीष्म ऽ ऋतुः क्षत्रं द्रविणम्.. (११)
आप दक्षिण दिशा में आरोहण करने की कृपा करें. त्रिष्टुप् रूपी धन आप की
रक्षा करने की कृपा करें. बृहत्साम रूपी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें.
पंचदश स्तोम धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु रूपी व पौरुष रूपी
धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( ११ )
प्रतीचीमारोह जगती त्वावतु वैरूप १७ साम सप्तदश स्तोमो वर्षा ऋतुर्विड्
द्रविणम्.. (१२)
आप पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. जगती रूपी धन आप की
रक्षा करें. वैरूप सामरूपी, दश स्तोम रूपी व वर्षा ऋतु रूपी धन आप की रक्षा
करें. ( १२ )
उदीचीमारोहानुष्टुप् त्वावतु वैराज १७ सामैकवि १७ श स्तोमः शरदृतुः फलं द्रविणम्.. (१३)
आप उत्तर दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. अनुष्टुप् रूपी फलदायी धन
आप की रक्षा करने की कृपा करें. वैराज साम रूपी फलदायी धन आप की रक्षा
करने की कृपा करें. एकविंश स्तोम फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा
करें. शरद ऋतु रूपी फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १३ )
ऊर्ध्वामारोह पङ्क्तिस्त्वावतु शाक्वररैवते सामनी त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ स्तोमौ
हेमन्तशिशिरावृतू वर्चो द्रविणं प्रत्यस्तं नमुचेः शिरः.. (१४)
आप ऊपर की ओर बढ़ने की कृपा करें. पंक्ति रूपी धन आप की रक्षा करें.
शाक्वर रूपी धन आप की रक्षा करें. रैवत साम रूपी धन आप की रक्षा करें.
यजुर्वेद - १११