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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 421 में से

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पृष्ठ 111

पूर्वार्ध नौवां अध्याय
वीर लोगों की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं, जो वीर यज्ञ के अधिष्ठाता हैं, वे वीर
धनवान व महिमावान होते हैं. ( १७ )
वाजे-वाजे ऽ वत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (१८)
हे अश्वो! आप बलवान हैं. ब्राह्मण, सत्य के ज्ञाता हमें धनधान्यमय बनाएं.
हमारा पालनपोषण करने की कृपा करें. बलवान घोड़े मधुर रस पी कर मदमस्त हो
कर तृप्त होते हुए देवयान पथ से आगे बढ़ने की कृपा करें. ( १८ )
आ मा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे.
आ मा गन्तां पितरा मातरा चा मा सोमो अमृतत्वेन गम्यात्.
वाजिनो वाजजितो वाज ꣳ ससृवा ꣳ सो बृहस्पतेर्भागमवजिघ्रत निमृजानाः.. (१९)
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हमारी रक्षा के लिए पधारें. सभी देवता हमारी रक्षा
के लिए आएं. मातापिता हमारी रक्षा के लिए आएं. हमें सोम रस के रूप में अमृत
प्राप्त हो. युद्ध में जीतने वाले वीर और बलशाली हों. बृहस्पति देव के अन्न भाग
को पवित्र मन से प्राप्त करने की कृपा कीजिए. ( १९)
आपये स्वाहा स्वापये स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाह्ने
मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन् ꣳ शिनाय स्वाहा विन् ꣳ शिन ऽ आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय
भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा.. (२०)
देवताओं की कृपा के लिए स्वाहा. अपने सुख के लिए स्वाहा. बारबार जन्म
लेने वाले देवता के लिए स्वाहा. यज्ञ देव के लिए स्वाहा. वसु देव के लिए स्वाहा.
दिनपति के लिए स्वाहा. मोहित करने वाले दिन के लिए स्वाहा. अंतगति तक
पहुंचाने वाले अविनाशी हेतु स्वाहा. लोक के लिए स्वाहा. भुवनपति के लिए स्वाहा.
अधिपति के लिए स्वाहा. ( २० )
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता ꣳ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं
यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्.
प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम.. (२१)
यज्ञ से हमारी आयु बढ़े. यज्ञ से हमारे प्राणों की बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी
नेत्रज्योति बढ़े. यज्ञ से हमारी श्रवणशक्ति बढ़े. यज्ञ से हमारी पीठ बढ़े. यज्ञ से हमारे
यज्ञ का विस्तार हो. हम प्रजापति की प्रजा हों. हम अपने में देवत्व पाएं. हम अमरता
पाएं. ( २१ )
अस्मे वो ऽ अस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चा ꣳ सि सन्तु वः.
नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्या ऽ इयं ते राड्यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः.
कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा.. (२२)
यजुर्वेद - १११