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सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 782 में से

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पृष्ठ 14

( ८ )
बृहस्पति ने मनु-सम्मत कुछ अन्य साधारण-धर्म का उल्लेख किया है :-
चतुर्दशान्नमनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
एष साधारणो धर्मः चातुर्वर्ण्योऽब्रवीन्मनुः ॥
( बृ० स्मृ० संस्कारकाण्ड, श्लो० ३१३ )
याज्ञवल्क्य के अनुसार साधारण-धर्म ये हैं-
अ-हिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रिय-निग्रहः ।
दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषान्धर्म-साधनम् ॥
( या० स्मृ० १।१२२ )
बृहस्पति ने साधारण-धर्म का निर्देश निम्न-निर्दिष्ट पद्य में किया है-
'दया क्षमाऽनसूया च शौचानायासमङ्गलम् ।
अकार्पण्यमस्पृहत्वं सर्व-साधारणानि तु ॥'
( बृ०स्मृति० संस्कारकाण्ड, श्लो० ४८९)
बृहस्पति ने इस श्लोक के प्रत्येक पद की व्याख्या भी की है, परन्तु उसका
उपस्थापन संक्षिप्त भूमिका में उचित नहीं है। अतः जिज्ञासुओं को संस्कार-
काण्ड के श्लोकों (४९० से ५०१ तक) को देखना चाहिए।
यहाँ एक प्रश्न उठता है कि यदि स्मृति का लक्ष्य प्रवृत्त-कर्म का ही विवरण है
तो इस का शास्त्रत्व ही लुप्त हो जाता है, क्योंकि कोई भी प्रबन्ध तभी शास्त्र कहलाने
योग्य होता है यदि वह मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट अभ्युदय ( = मोक्ष ) का प्रसाधक
हो ( शास्त्रत्वं हित-शासनात् ) । प्रवृत्त-कर्म के अनुष्ठान से मोक्ष की अधिगति तो
सम्भव ही नहीं है। अतः प्रवृत्त-कर्म का विधान करने-वाला धर्म-शास्त्र वस्तुतः
शास्त्र नहीं है।
इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि स्मृति में प्रवृत्त-कर्म का
प्रतिपादन है तथाऽपि स्मृति का तात्पर्य प्रवृत्त-कर्म में नहीं है अपि तु प्रवृत्त-कर्म
के द्वारा चित्त-शुद्धि कर निवृत्ति-मार्ग की अधिगति में ही। अत एव मनु ने
कहा है-
विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ (मनु० २।१)
यदि राग-द्वेष-हीन होकर मनुष्य किसी भी कर्म का अनुष्ठान करता है तो
वह कर्म वस्तुतः प्रवृत्त नहीं है। यदि कथमपि उसे प्रवृत्त भी कहा जाय तब भी
उससे निवृत्ति की अधिगति तो निर्बाध ही है। प्रवृत्त-कर्म का अनुष्ठान तो निवृत्त-
कर्म की पूर्व-पीठिका है। अतः गीता का भी उपदेश है-
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
स्मृतिकार का भी प्रवृत्त-कर्म के अनुविधान में यही उद्देश्य है। याज्ञ-
वल्क्य ने तो स्पष्ट रूप में कहा है-