व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण
महामुनिश्रीपतञ्जलिविरचितम्
महाभाष्यम्
(पस्पशाह्निकम्)
अनुवादक एवं व्याख्याकार
रमण कुमार शर्मा
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
: दिल्ली :
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महामुनिश्रीपतञ्जलिविरचितम्
महाभाष्यम्
(पस्पशाह्निकम्)
अनुवादक एवं व्याख्याकार
रमण कुमार शर्मा
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
: दिल्ली
प्रकाशक :
ईस्टर्न बुक लिंकर्स
५८२५, न्यू चन्द्रावल, जवाहर नगर, दिल्ली-११०००७
© लेखक
प्रथम संस्करण : १६८२ (दिल्ली)
मुद्रक : अमर प्रिंटिंग प्रेस (श्याम प्रिंटिंग एजेन्सी),
८/२५, विजय नगर, दिल्ली-११०००६
निवेदनम्
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
रमण कुमार शर्मा
विषयसूची
१: पतञ्जलि, महाभाष्य और पस्पशाह्निक ७
२. पस्पशाह्निकम्—प्रदीप-भाष्यानुवाद-उषा-व्याख्या-संवलितम्— १-८०
१. अथ शब्दानुशासनम् १
२. गौरित्यत्र कः शब्दः ३
३. शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि ६
४. शास्त्रस्याधिकारी २७
५. शास्त्रप्रारम्भविधिः २८
६. किं पुनराकृतिः पदार्थ आहोस्वित् द्रव्यम् ३३
७. सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ३६
८. द्रव्यः पदार्थः ४२
९. आकृतिः पदार्थः ४४
१०. लोकस्य प्रामाण्यम् ४६
११. लोकतः अर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः ४७
१२. अस्त्यप्रयुक्तः ५१
१३. शब्दस्य ज्ञाने धर्मं आहोस्वित्प्रयोगे ५६
१४. व्याकरणमित्यस्य शब्दस्य पदार्थः ६२
१५. किमर्थो वर्णानामुपदेशः ७०
भूमिका
पतञ्जलि, महाभाष्य और पस्पशाह्निक
प्रक्रियात्मक और दार्शनिक इन दोनों ही पक्षों में समान गति होने के कारण
व्याकरण समस्त ज्ञान शाखाओं में विशिष्ट है । सूक्ष्म रूप से यदि विचार किया
जाये तो व्याकरणशास्त्र के इन दोनों ही पक्षों के मूल को एक ही वैदिक वाक्य
“इष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः”१ में ढूंढा जा सकता है । वाणी के
चार भागों की कल्पना वैदिक ऋषि के चिन्तन की पराकाष्ठा है ।२ वेद का यही
वाक्तत्त्व ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यात होकर पुनः औपनिषदिक विवेचन का आधार
बना । गोपथब्राह्मण में ३ शब्द के प्रकृतिप्रत्यय विभाग के सम्बन्ध में “ओंकारं
पृच्छामः । को धातुः, कि प्रातिपदिकं, कि नामाख्यातं, कि लिङ्गं, कि वचनं,
का विभक्तिः, कः प्रत्ययः इति” इस प्रकार के अनेक प्रश्न उठाये गये हैं । इन
समस्त प्रश्नों का समाधान भी किया गया । विषय के विशेषज्ञ वैयाकरण आचार्य
इस समय तक प्रसिद्ध हो गये थे, इसका उल्लेख भी यहीं मिलता है ४—“आख्यातो-
पसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च संस्थानाध्यायिन आचार्याः पूर्वे
बभूवुः ।” पाणिनि ने अपने शब्दानुशासन में अनेक वैयाकरणाचार्यों का उल्लेख
किया है । स्वयं महाभाष्य में भी ऐन्द्र व्याकरण की ओर संकेत है जिसमें
प्रतिपदपाठ की पद्धति से शब्दानुशासन किया गया था ।५
इस पूर्ववर्ती व्याकरणपरम्परा को उपजीव्य बनाकर महावैयाकरण
पाणिनि ने पदसाधुत्व के हेतु अष्टाध्यायी के रूप में सूत्र ग्रन्थ का निर्माण कर
वैदिक भाषा को संस्कृत किया । अनेक वैयाकरणों ने इन सूत्रों पर वार्त्तिकों
का निर्माण किया । वार्त्तिककारों में कात्यायन सर्वप्रमुख हैं । सुनाग का नाम भी
वार्त्तिककार के रूप में उपलब्ध होता है । पतञ्जलि का महाभाष्य इन्हीं वार्त्तिकों
१. यजुर्वेद १६.१७
२. (क) चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । —ऋग्वेद १।१६४।४५
(ख) चत्वारि शृङ्गा० ऋग्वेद ४।५८।३ इस मन्त्र पर महाभाष्य का व्याख्यान ।
३. गोपथब्राह्मण, प्रथम प्रपाठक १।२४
४. वही १।२७
५. बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां पारायणं प्रोवाच···।
बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता···। —महाभाष्यम्, पस्पशाह्निकम् ।
( vi )
पर एक बृहद् व्याख्यान है, जिसे वस्तुतः पाणिनि व्याकरण के उत्कर्ष का चरम
कहा जा सकता है। दर्शन से नितान्त अस्पृष्ट अष्टाध्यायी के सूत्रों में दार्शनिकता
की गन्ध ढूंढकर उनका नये ढंग से व्याख्यान किया गया। भर्तृहरि ने इसे संग्रह
प्रतिकञ्चुक कहा है जो इस बात का प्रतीक है कि यह संग्रह के समान व्याकरण
का दार्शनिक ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से सरल होने पर भी यह भावगाम्भीर्य के
कारण दुर्बोध है। अपने प्रौढ पाण्डित्य, गम्भीर अर्थविवेचना और व्यापक
दृष्टि के कारण यह भाष्य ही नहीं, महाभाष्य कहा जाता है। इस प्रसङ्ग में
भर्तृहरि के—
कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना ।
सर्वेषां न्यायबीजानां महाभाष्ये निबन्धने ।। वाक्य २।४८५.
इस कथन पर पुण्यराज की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है—
“तच्च भाष्यं न केवलं व्याकरणस्य निबन्धनं यावत्सर्वेषां न्यायबीजानां बोद्धव्य-
मित्यत एव सर्व न्यायबीजहेतुत्वादेव महच्छब्देन विशिष्य महाभाष्यमित्युच्यते लोके ।”
कैय्यट की भी इस विषय में स्पष्ट उक्ति है—
पाणिनीयव्याख्यानभूतत्वेऽपि इष्ट्यादिकथनेन अन्वाख्यातृत्वादस्य इतर-
भाष्यवैलक्षण्येन महत्त्वम् ।।
खण्डनमण्डनात्मक शैली में वार्त्तिककारों के मतों का सूक्ष्म परीक्षण करते
हुए व्याख्यानमुखेन व्याकरण के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रतिपादन के साथ-साथ
विभिन्न शास्त्रों के सिद्धान्तों का भी यथास्थान निवेश हो गया है। यह भी इस
भाष्य के महत् विशेषण का हेतु है। इसी ग्रन्थ में बीज रूप से निर्दिष्ट विशेषण
के आधार पर आगे चलकर भर्तृहरि ने व्याकरण को दर्शनत्व की उच्च भूमि पर
आरूढ़ किया तथा नागेश और उसके टीकाकारों ने आगे चलकर इसे नव्यन्याय की
शैली पर प्रतिष्ठापित करने का गौरव प्राप्त किया किन्तु पतञ्जलि का वैशिष्ट्य
फिर भी बना रहा क्योंकि सरल से सरल भाषा में अत्यन्त दुरूह विषय को भी
संवादमयी सहज शैली में प्रस्तुत कर पाना पतञ्जलि के द्वारा ही सम्भव है। स्थान
स्थान पर प्रयुक्त होने वाली सूक्तियां और कहावतें भाषा और भावों को भी
जीवन्तता प्रदान करती हैं। “यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्” की कल्पना ने इनके
महत्त्व को और भी बढ़ा दिया जहाँ सूत्रकार और वार्त्तिककार की भी अपेक्षा से
भाष्यकार का मत अधिक प्रशस्त माना जाता है।
लोकव्यवहार में प्रचलित प्रयोगों को शास्त्र की सीमाओं में बाँधने के
लिए पतञ्जलि ने इष्टियों का निर्माण किया। प्रकारान्तर से यह इस बात का भी
प्रतीक है कि पतञ्जलि शास्त्र की अपेक्षा लोक को ही अधिक महत्त्व देते थे।
वैयाकरण तथा सूत के संवाद में जहाँ प्राप्ति और इष्टि की बात को उठाकर
इष्टि को अधिक महत्त्वपूर्ण कहा गया है, वह प्रसङ्ग भी इसी तथ्य को पुष्ट करता
है। पतञ्जलि की यह मान्यता पश्चाद्वर्ती वैयाकरणों में भी इसी रूप में स्वीकार
हुई। महाकवि श्रीहर्ष ने भी इस बात को समर्थन देते हुए कहा है कि शश से
युक्त पदार्थ को शशी मानकर भी तदनुरूप मृग से युक्त पदार्थ को मृगी नहीं कहा
जाता क्योंकि यह प्रयोग लोक व्यवहार में स्वीकार्य नहीं हुआ—
भङ्क्तुं प्रभुर्व्याकरणस्य दर्पं पदप्रयोगाध्वनि लोक एषः ।
शशो यदस्यास्ति शशी ततोऽयमेवं मृगोऽस्यास्ति मृगीति नोक्तः ।।
नैषध०-२२।८४.
वाक्यपदीयकार के अनुसार कालान्तर में पतञ्जलि के शिष्यों बैजि, सौभव
और हर्यक्ष ने शुष्क तर्कपद्धति का आश्रय लेकर इस ग्रन्थ के महत्त्व को घटा
दिया,⁶ जिससे यह एक लम्बे समय तक लुप्त प्राय ही रहा। केवल ग्रन्थ रूप में यह
अस्तव्यस्त रूप में अवशिष्ट रहा। भर्तृहरि और कल्हण⁷ दोनों ने चन्द्राचार्य
को महाभाष्य का उद्धारक माना है। उसके बाद भर्तृहरि ने महाभाष्य पर 'त्रिपदी'
नाम की टीका लिखी। कैयट ने अपने महाभाष्य प्रदीप पर त्रिपदी का प्रभाव
स्वयं स्वीकार किया है। प्रदीप पर नागेशभट्ट ने उद्योत नाम का व्याख्यान लिखा ।
प्रदीपोद्योत पर वैद्यनाथ पायगुण्डे की छाया नाम की व्याख्या भी उपलब्ध
होती है जिस पर काशी विश्वविद्यालय के व्याकरणाचार्य पं० रुद्रधर झा ने
१९५४ में 'तत्त्वालोक' नाम की टीका लिखी है।
सम्पूर्ण महाभाष्य कुल ८५ आह्निकों में विभक्त है। 'आह्निक' शब्द का
अर्थ है—एक दिन में अधीत अंश । ग्रन्थ की शैली भी इसी प्रकार की है मानों
गुरु अपने शिष्यों को विद्याभ्यास करवा रहा हो। व्याकरण शास्त्र के मूल
सिद्धान्तों को सरलतम रूप में हृदयङ्गम कराने की दृष्टि से यह शैली अत्यन्त
आकर्षक, रोचक तथा उपयुक्त है।
पस्पशाह्निक इस विशाल ग्रन्थ का प्रथम आह्निक है जिसे वस्तुतः सम्पूर्ण
ग्रन्थ की प्रस्तावना कहा जा सकता है। 'पस्पश' शब्द प्रारम्भ अथवा उपोद्घात
के अर्थ में प्रयुक्त होता है। माघ के 'शिशुपालबधम्' में यह शब्द गुप्तचर के अर्थ
में भी प्रयुक्त हुआ है जहाँ श्लेष की सहायता से गुप्तचरों के बिना राज्य की
श्रीहीनता की उपमा पस्पशाह्निक के बिना शब्दविद्या की शोभाहीनता से की गई
है—"शब्दविद्येव नो भाति राजनीतिरपस्पशा ।" एवं च प्रकारान्तर से महाकाव्य
का यह प्रसङ्ग पस्पशाह्निक के महत्त्व को भी स्पष्ट कर पाने में कृतकार्य हुआ है।
६. बैजिसौभवहर्यक्षैः शुष्कतर्कानुसारिभिः ।
आर्षे विप्लावित ग्रन्थे सङ्ग्रहप्रतिकञ्चुके ॥ —वाक्य० २।४८७
७. राजतरङ्गिणी १।१७५
( viii )
पस्पशा शब्द का महाकाव्यसम्मत अर्थ भी पस्पशाह्निक पर इस रूप में चरितार्थ
हो जाता है कि यहाँ भी वस्तुतः व्याकरणदर्शन के अनेक निगूढ़ प्रश्नों पर विचार
प्रस्तुत किया गया है।
व्याकरणशास्त्र लौकिक और वैदिक उभयविध शब्दों के साधुत्व का अनुशासन
करता है, अतः सर्वप्रथम शब्दस्वरूप पर विचार किया गया है। अखण्ड और नित्य
स्फोटरूप शब्दब्रह्म की संसिद्धि वैयाकरणों को अभीष्ट है। इसी मत की स्थापना के
निमित्त ही द्रव्य, गुण, क्रिया और जातिशब्दवादियों के सिद्धान्त को पूर्वपक्ष के रूप
में स्थापित कर उनका प्रत्याख्यान किया गया है। वह नित्य तत्त्व जो ध्वनि से
व्यक्त होता है तथा उच्चरित होने पर तत्तदर्थ का बोध करवाता है। वैयाकरणों
की दृष्टि में शब्द है। इसे ही स्फोट का नाम दिया गया है। यद्यपि लोकव्यवहार
की दृष्टि से ध्वनि में भी पतञ्जलि ने शब्दत्व स्वीकार किया ही है। इन्हीं ध्वनि-
रूप शब्दों का साधुत्व प्रतिपादन ही व्याकरणशास्त्र का विषय है।
तदनन्तर व्याकरणशास्त्र अथवा व्याकरणाध्ययन के मुख्य एवं गौण
प्रयोजनों का अन्वाख्यान किया गया है। वेदों की रक्षा के लिए तो व्याकरणाध्ययन
अनिवार्य है ही, आगम (शास्त्र) भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक है—
रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम् ।
आगमः खल्वपि। ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ।
इस विवेचन में पतञ्जलि के वेदविषयक पाण्डित्य का परिचय भी उपलब्ध
होता है, जहाँ अनेक वैदिक मन्त्रों को उद्धृत करके उनका व्याख्यान किया गया है।
“चत्वारि शृङ्गा०" इत्यादि मन्त्र का शब्दब्रह्म को लक्ष्य करके पतञ्जलि ने
मौलिक व्याख्यान प्रस्तुत किया है। इससे पूर्व यास्क ने इसी मन्त्र को यज्ञपुरुष के
रूप में व्याख्यात किया था। बाद में राजशेखर ने इसी मन्त्र की सहायता से
काव्यपुरुष के शरीर का निर्माण किया।
शब्दों का साधुत्वप्रतिपादन शब्दानुशासन शास्त्र का विषय है, “रक्षोहागम-
लघ्वसन्देहाः" इसके प्रयोजन । अधिकारी का निर्देश तेभ्य एव विप्रतिपन्न-
बुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः सुहृद्भूत्वाऽऽचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे, इस वाक्य के द्वारा हुआ
है। प्रमेय रूप शब्दज्ञान तथा साधन रूप शब्दानुशासन में परस्पर बोध्यबोधकभाव
सम्बन्ध है।
शास्त्र का विषयभूत यह शब्दोपदेश साधु शब्दों, असाधु शब्दों तथा साधु
और असाधु उभयविध शब्दों के उपदेश को लेकर भी किया जा सकता है। उभयविध
शब्दोपदेश की पद्धति में स्पष्टता और सरलता होते हुए भी यह गौरव दोष से
दूषित है, अतः इसे स्वीकार नहीं किया गया। अपशब्दोपदेश से भी साधु शब्दों का
का अनुमान किया जा सकता है। गावी, गोणी इत्यादि समस्त असाधु शब्दरूपों
को एक स्थान पर उल्लिखित देखकर उनसे व्यतिरिक्त एक साधु शब्द तक पहुँचाया
(2) रिश्च (3)?
Wait, could it be a misprint in this edition?
Let's look at the typeset word in the image, letter by letter:
- First letter: ल with left matra ि = 'लि'
- Second letter: ङ् + ग = ङ्ग, with an e-matra on top = ङ्गे (or ङ्गै)
- Third letter: it looks like 'इ' or 'र' with something?
Wait! Look at the word:
Could it be "लिङ्गैरिश्च"?
Wait, why would there be "लिङ्गैरिश्च"?
Wait, what if it's "लिङ्गेभिश्च"?
Wait! Look at the letter:
Could it be 'भ' in old Devanagari?
In old Devanagari, 'भ' is NOT written like an S!
What letter IS written like an S in Devanagari?
'ड' (da)
'इ' (i)
'ह' (ha - top is S-like)
Wait! What if the typesetter misread "लिङ्गैश्च"?
How would "लिङ्गैश्च" be typeset?
ल + ि = लि
ङ्ग + ै = ङ्गै
श + ् + च = श्च
If it was just "लिङ्गैश्च", there would be:
लि - ङ्गै - श्च.
Three aksharas!
Let's count how many aksharas are
( x )
सहस्र वस्तुओं पर विचार किया था। द्रव्याभिधानवाद,८ वाक्यार्थवाद,६ शब्दप्रकृति-
अपभ्रंशवाद और नित्यशब्दत्ववाद व्याडि के मुख्य सिद्धान्त हैं।
शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध की नित्यता का ज्ञान लोकव्यवहार से होता
है। इसके समर्थन में पतञ्जलि ने एक सुन्दर आख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा है कि
घट प्रयोग की इच्छा करने वाला व्यक्ति जिस प्रकार से कुम्भकार के पास जाकर
घट का क्रय कर लेता है, उसी प्रकार से कोई शब्द प्रयोग के लिए वैयाकरण के पास
शब्द का क्रय करने नहीं जाता। लोकव्यवहार से ही शब्दार्थसम्बन्धों की नित्यता
सिद्ध होने पर भी शास्त्र के द्वारा उनका धर्मनियमन किया जाता है।
शब्दों का साधुत्व व्यवहार के आश्रित है अतः अन्वय-व्यतिरेक से जो शब्द
लोक में व्यवहृत नहीं होते, उनमें स्वतः ही असाधुत्व आ जाता है, परन्तु शास्त्र में
अनेक ऐसे शब्दों का भी अनुशासन होता है जो लोक व्यवहार में प्रचलित नहीं हैं,
अतः असाधु (लोक में अप्रचलित) शब्द का अनुशासन करने से शास्त्र अनिष्टानुशासन
से दूषित हो जायेगा परन्तु दीर्घकालीन शतवार्षिक और सहस्रवार्षिक यज्ञों के समान
इन शब्दों का अनुशासन भी धर्म मानकर अवश्यंकर्त्तव्य है। जिस प्रकार से आज इन
दीर्घकालीन यज्ञों को कोई नहीं कर सकता किन्तु फिर भी शास्त्र से उनका विधान
होता ही है, उसी प्रकार से अप्रयुक्त होने पर भी इनका अनुशासन दोषयुक्त नहीं है,
प्रत्युत आवश्यक है। और फिर शब्द प्रयोग के महान् विषयक्षेत्र को अनदेखा करके
किसी शब्द जो अप्रयुक्त नहीं कहा जा सकता। अतः शास्त्र में इस दोष की प्रसक्ति
की सम्भावना नहीं की जा सकती।
साधु शब्द अभ्युदय का हेतु है। असुर “हेलयो हेलयः” इस प्रकार कहते हुए
पराभव को प्राप्त हुए, यह इस बात का प्रतीक है कि केवल ज्ञानमात्र से नहीं प्रत्युत
साधु शब्द के प्रयोग से ही धर्म की प्राप्ति होती है किन्तु व्यवहार में यह धर्मनियमन
केवल याज्ञिक क्रियाओं में ही लागू होता है। यर्वाणः, तर्वाणः नामक ऋषियों का
प्रसङ्ग इस बात को पुष्ट करता है, जो ‘यद्वानः,’ ‘तद्वानः’ इन शब्दों के स्थान पर
असाधु यर्वाणः, तर्वाणः शब्दों का प्रयोग किया करते थे और इसीलिए उनका नाम
भी यर्वाणः, तर्वाणः पड़ गया था परन्तु याज्ञिक क्रियाओं में शुद्ध उच्चारण करने के
कारण वे दूषित नहीं हुए। तथापि सिद्धान्त रूप में श्रुति का अनुसरण करते हुए
८. (क) द्रव्याभिधानं व्याडिः । —महाभाष्य १।२।६४
(ख) वाजप्यायनस्याकृतिः । व्याडेस्तु द्रव्यम् । महाभाष्यदीपिका, पृ० ११
६. न हि किञ्चित्पदं नामरूपेण नियतं क्वचित् ।
पदानां रूपमर्थो वा वाक्यार्थादेव जायते ॥
—वाक्य० १।२४ की हरिवृत्ति में उद्धृत ।
१०. शब्दप्रकृतिरपभ्रंश इति संग्रहकारः । —वाक्य १।१४८ की हरिवृत्ति में ।