व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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एतेषामपीति । शिष्टप्रयुक्तत्वेनोणादीनां पृषोदरादीनां च साधुत्वाभ्यनुज्ञानात्
सर्वेषामत्र सङ्ग्रहः सिद्धः ।
इत्युपाध्यायजैयटपुत्रकैयटकृते महाभाष्यप्रदीपे प्रथमाध्यायस्य
प्रथमपादे प्रथममाह्निकम्
अनुवाद—अथवा या इससे (संवृतादि दोषों की प्रसक्ति बताने वाले से)
यह पूछना चाहिए कि ये संवृत आदि कहाँ सुने जाते हैं ।
आगमों में ।
आगम तो शुद्ध पढ़े गये हैं ।
तो विकारों में ।
विकार भी शुद्ध पढ़े गये हैं ।
तो प्रत्ययों में ।
प्रत्यय भी शुद्ध पढ़े गये हैं ।
तो धातुओं में ।
धातुएँ भी शुद्ध पढ़ी गई हैं ।
तो प्रातिपदिकों में ।
प्रातिपदिक भी शुद्ध पढ़े गये हैं ।
तो प्रातिपदिकों का उपदेश नहीं किया गया है ।
इनका भी स्वर वर्णानुपूर्वी के ज्ञान के लिए उपदेश करना चाहिए (जिससे)
शश (के स्थान पर) षष न हो जाये, पलाश (के स्थान पर) पलाष न हो जाये,
मञ्चक (के स्थान पर) मञ्जक न हो जाये ।
आगम, आदेश और प्रत्ययों सहित धातुएं शुद्ध पढ़ी गई हैं, अतः (इनमें)
इन कलादि (दोषों) का प्रसङ्ग नहीं है ।
(इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाकाव्य में प्रथमाध्याय
के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक का अनुवाद समाप्त हुआ)
उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखा ।" इस समस्त विवेचन के अनन्तर
भाष्यकार ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार किया है ! सिद्धान्ती के अनुसार
आगम, आदेश, प्रत्यय, धातु आदि सभी का शुद्ध उच्चारण किया गया है । अतः
इनमें कहीं भी कलादि दोषों की प्रसक्ति प्राप्त नहीं होती । अतः इन दोषों की
सम्भावना करना ही व्यर्थ है ।
एवं च सिद्धान्ती के द्वारा पूर्वप्रतिपादित इष्टबुद्ध्यर्थ वर्णोपदेश का पक्ष
सिद्ध होता है ।
(इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाभाष्य में
प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक पर उषा व्याख्या समाप्त हुई)