व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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इसमें आपको क्या जलन है, यदि समस्त लोक अभ्युदय से युक्त हो जायें ?
(हमें) कोई जलन नहीं है (परन्तु) प्रयत्नानर्थक्य तो उपपन्न हो जायेगा ।
प्रयत्न को फलवान् होना चाहिए । प्रयत्न फल से व्यतिरिक्त नहीं होना चाहिए ।
निश्चित ही जिन्होंने प्रयत्न किया है वे शब्दों का साधु प्रयोग करेंगे, वे ही
अधिक अभ्युदय से युक्त होंगे ।
वैपरीत्य भी देखा जाता है । प्रयत्न करने वाले अकुशल और प्रयत्न न करने
वाले कुशल देखे जाते हैं । वहाँ फल का भी वैपरीत्य होगा ।
उषा:—शब्द ज्ञान में धर्मोपलब्धि का निरास करके प्रस्तुत अवतरण
शब्द प्रयोग से धर्मोपलब्धि में दूषण दिखाता है । शब्द प्रयोग से धर्मप्राप्ति यदि
सम्भव हो तो सभी प्रयोगमात्र से अभ्युदय से युक्त हो जायेंगे, भले ही उन्होंने
शास्त्र का अनुशीलन अथवा व्याकरण का अध्ययन किया हो अथवा नहीं । ऐसी
परिस्थिति में वैयाकरण और अवैयाकरण दोनों के द्वारा किये गये प्रयोग समान
रूप से फलवान् होंगे । (व्याकरणाध्ययन रूप) प्रयत्न के बिना ही यदि अभ्युदय
रूप फल की प्राप्ति होने लगे तो प्रयत्न — वैयर्थ्यप्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा ।
ऐसी स्थिति में यह भी नहीं कहा जा सकता कि जो प्रयत्न करेंगे वे अधिक
कुशल प्रयोग से अधिक अभ्युदय से युक्त होंगे । कुछ लोग व्यवहार में प्रत्युत्पन्न-
मतित्व के अभाव में प्रयोग में प्रौढ़ नहीं हो पाते, अन्य लोग व्याकरण का अध्ययन
किये बिना ही व्यवहार से शब्दज्ञान करके उनके प्रयोग में अधिक कुशल हो जाते
हैं । मुग्ध वैयाकरण की अपेक्षा प्रौढ़ अवैयाकरण भी साधु शब्दों का कुशल
प्रयोग करता है ।
एवं च, प्रयोग पक्ष में भी धर्म प्राप्ति की बात को स्वीकार नहीं किया जा
सकता ।
मूलम्—एवं तर्हि नापि ज्ञान एव धर्मो नापि प्रयोग एव
किं तर्हि ?
- शास्त्रपूर्वके प्रयोगेऽभ्युदयस्तत्तुल्यं वेदशब्देन —
शास्त्रपूर्वकं यः शब्दान्प्रयुङ्क्ते सोऽभ्युदयेन युज्यते । तत्तुल्यं वेदशब्देन ।
वेदशब्दा अप्येवमभिवदन्ति — "योऽग्निष्टोमेन यजते य उ चैनमेवं वेद," "योऽग्निं
नाचिकेतं चिनुते य उ चैनमेवं वेद ।"
अपर आह—तत्तुल्यं वेदशब्देनेति । यथा वेदशब्दा नियमपूर्वमधीताः
फलवन्तो भवन्त्येवं यः शास्त्रपूर्वकं शब्दान्प्रयुङ्क्ते सोऽभ्युदयेन युज्यत इति ।
प्रदीपः—तत्तुल्यमिति । वेदः शब्दो यस्यार्थस्य स वेदशब्दस्तस्य यथा
ज्ञात्वानुष्ठानं तथा शब्दानापि प्रकृत्यादिविभागज्ञानपूर्वकः प्रयोग इत्यर्थः । अपर
आहेति । वेदश्चासौ शब्दश्च वेदशब्द इति कर्मधारयः ।