व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउभयथा ह्याचार्येण सूत्राणि पठितानि । आकृतिं पदार्थं मत्वा—"जात्या-
ख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्" इत्युच्यते । द्रव्यं पदार्थं मत्वा "सरूपाणाम्"—
इत्येकशेष आरभ्यते ।
प्रदीप.—सकलशास्त्रव्यवस्थैकतरपक्षाश्रयणे न सिध्यतीति पक्षद्वयाश्रयणं
प्रश्नपूर्वकं करोति—किं पुनरिति । आकृतिपक्षे केवल आश्रीयमाणे सकृद्गतौ
विप्रतिषेध इत्यादि नोपपद्यते, केवलेपि व्यक्तिपक्षे पुनः प्रसङ्गविज्ञानादित्यादि
न घटते । तस्माल्लक्ष्यसिद्धये क्वचित्प्रदेशे कश्चित्पक्षः परिगृह्यते । तत्र जातिवादिन
आहुः—जातिरेव शब्देन प्रतिपाद्यते, व्यक्तीनामानन्त्यात्सम्बन्धग्रहणासम्भवात् ।
सा च जातिः सर्वव्यक्तिष्वेकाकारप्रत्ययदर्शनादस्तीत्यवसीयते । तत्र गवादयः शब्दा
भिन्नद्रव्यसमवेतां जातिमभिदधति । तस्यां प्रतीतायां तदावेशात्तदवच्छिन्नं द्रव्यं
प्रतीयते । शुक्लादयः शब्दा गुणसमवेतां जातिमाचक्षते । गुणे तु तत्सम्बन्धात्प्रत्ययः,
द्रव्ये सम्बन्धिसम्बन्धात् । संज्ञाशब्दानामप्युत्पत्तिप्रभृत्या विनाशात्पिण्डस्य कौमार-
यौवनाद्यवस्थाभेदेऽपि स एवायमित्यभिन्नप्रत्ययनिमित्ता डित्थत्वादिका जातिर्वाच्या ।
क्रियास्वपि जातिर्विद्यते सैव धातुवाच्या । पठति पठतः पठन्तीत्यादेरभिन्नस्य प्रत्ययस्य
सद्भावात्तन्निमित्तजात्यभ्युपगमः । व्यक्तिवादिनस्त्वाहुः—शब्दस्य व्यक्तिरेव वाच्या,
जातेस्तूपलक्षणभावेनाश्रयणादानन्त्यादिदोषानवकाशः ।
अनुवाद—क्या आकृति पद का अर्थ है, अथवा द्रव्य ।
"दोनों ही," ऐसा (सूत्रकार) कहता है ।
कैसे जाना जाता है ?
दोनों ही प्रकार के आचार्य ने सूत्र पढ़े हैं । आकृति को पदार्थ मानकर
"जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम्" ऐसा कहा जाता है । द्रव्य को पदार्थ
मानकर "सरूपाणाम्०"—इत्यादि एकशेष शास्त्र का आरम्भ किया गया है ।
उषा—पतञ्जलि से पूर्व वाजप्यायन और व्याडि पद के अर्थ के सम्बन्ध में
क्रमशः जाति और व्यक्ति अथवा आकृति और द्रव्य का विस्तृत विवेचन कर चुके
थे । महाभाष्यकार ने इन दोनों वादों में समन्वय स्थापित किया । "चतुष्टयी
शब्दानां प्रवृत्तिः" कहकर एक स्थल पर जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा के रूप
में चार प्रकार की शब्द प्रवृत्ति की बात स्वीकार की है ।
शब्दानुशासन के प्रणेता आचार्य पाणिनि भी जाति और व्यक्ति दोनों में
ही पदों का वाचकत्व स्वीकार करते हैं । इसलिए दोनों ही प्रकार के सूत्र अष्टा-
ध्यायी में प्राप्य हैं । व्यक्तिपक्ष के ही सर्वत्र पदार्थत्वेन इष्ट होने पर "सम्पन्ना
व्रीहयः" इत्यादि स्थलों में, जहाँ अनेकत्व सिद्ध ही है, "जात्याख्यायामेकस्मिन्बहु-
वचनमन्यतरस्याम्" सूत्र के निर्माण की आवश्यकता ही नहीं रहती । इसी प्रकार से
जाति ही यदि पदार्थत्वेन इष्ट हो तो उसके सर्वत्र एकवचनान्त होने के कारण एकत्व