व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २७
निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ।" यही उसका सत्यदेवत्व है । हम भी वरुण के समान
ही इस उच्च प्रतिष्ठित पद को प्राप्त हों, इसके लिए व्याकरण का अध्ययन
अनिवार्य है ।
मूलम्—किं पुनरिदं व्याकरणमेवाधिजिगांसमानेभ्यः प्रयोजनमन्वाख्यायते,
न पुनरन्यदपि किञ्चित् । ओमित्युक्त्वा वृत्तान्तशः शमित्यादीन् शब्दान्पठन्ति ।
पुराकल्प एतदासीत् — संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्माधीयते । तेभ्य-
स्तत्तत्स्थानकरणानुप्रदानज्ञेभ्यो वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते । तदद्यत्वे न तथा ।
वेदमधीत्य त्वरिता वक्तारो भवन्ति — "वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च
लौकिकाः । अनर्थकं व्याकरणमिति ।" तेभ्य एवं विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः
सुहृद्भूत्वा आचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे । इमानि प्रयोजनान्यध्येयं व्याकरणमिति ।
प्रदीपः—किं पुनरिति । ननु कानि पुनरस्येति येन पृष्टं स एव कथं
पृच्छति — किं पुनरिति । एवं तर्हि भाष्यकारः प्रयोजनान्वाख्यानस्य विषयविभागं
दर्शयति । पुरा वेदाध्ययनात्पूर्वं व्याकरणमधीयते ते बाल्यात्प्रष्टुमसमर्था इति न
प्रयोजनमन्वाख्येयम् । अद्यत्वे तु स्वल्पायुष्ट्वात्पूर्वमेव वेदं प्रधानमधीयते ततः प्रष्टुं
समर्थत्वाद् व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं पृच्छन्तीत्यवश्यान्वाख्येयं प्रयोजनम् न
पुनरन्यदिति । वेदमप्यधिजिगांसमानेभ्य इत्यर्थः । ओमित्युक्त्वेति । अभ्युपगम्येत्यर्थः ।
वृत्तान्तश इति । वृत्तान्तः प्रपाठक उच्यते । वृत्तान्तं वृत्तान्तं पठन्तीत्यर्थः । अद्यत्व
इति । अद्यत्वेशब्दो निपातोऽस्मिन्काल इत्यत्रार्थे वर्तते । त्वरिता इति । विवाहादौ ।
अनुवाद — क्या फिर यह व्याकरण पढ़ना चाहने वालों के लिए प्रयोजन
बताये जा रहे हैं या कुछ और भी ? (वेद पढ़ना चाहने वाले) 'ओम्' ऐसा कहकर
प्रति प्रपाठक 'शम्' पर्यन्त शब्दों को पढ़ते हैं । पुराकाल में ऐसा था कि (उपनयन)
संस्कार के अनन्तर ब्राह्मण व्याकरण का अध्ययन करते थे । तत्तत् वर्णोच्चारण-
स्थान, करण और अनुप्रदान जान लेने पर उन्हें वैदिक शब्दों का उपदेश किया
जाता था । आजकल वैसा नहीं है । (पहले) वेद का अध्ययन करके शीघ्र ही
कहने लगते हैं, वेद से हमने वैदिक शब्द जान लिये हैं, लोक से लौकिक । इसलिए
व्याकरण अनर्थक है । उन्हीं विप्रतिपन्न बुद्धि वाले अध्येताओं को सुहृद होकर
आचार्य इस शास्त्र का आख्यान करते हैं — "ये प्रयोजन हैं, (इसलिए) व्याकरण
का अध्ययन करना चाहिए ।"
उषा — उपनयन संस्कार के अनन्तर बालक को वेद का अध्ययन करवाया
जाता है, अतः ऐसी परिस्थिति में वेदाध्ययन के प्रयोजनों का अन्वाख्यान होना
चाहिए था, व्याकरणाध्ययन के प्रयोजनों का नहीं । इसी आशंका के अनुरोध से
भाष्यकार ने कहा है कि पुरा काल में ब्राह्मण बालक को उपनयन संस्कार के
अनन्तर पहले व्याकरण का अध्ययन करवाया जाता था । उस समय में विभिन्न