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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 96 में से

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पृष्ठ 37

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २३
य एष दुर्गो मार्गः, एकगम्यो वाग्विषयः ।
के पुनस्ते ?
वैयाकरणाः ।
कुत एतत् ?
भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि । एषां वाचि भद्रा लक्ष्मीर्निहिता भवति ।
लक्ष्मीर्लक्षणाद्भासनात्परिवृढा भवति । सक्तुमिव ।
प्रदीपः—सचतेरिति । षच सेचन इत्यस्य । दुर्धाव इति । दुःशोधः । यथा
तितउना सक्तोस्तुषाद्यपनीयते तथा व्याकरणेन वाचोऽपशब्दा इत्यर्थः । कसतेरिति ।
पृषोदरादित्वादवर्णव्यत्ययः । ततवदिति । विस्तारयुक्तमित्यर्थः । तुन्नवदिति ।
बहुच्छिद्रम् धीरा इति । वैयाकरणाः । वाचमक्रतेति । अपशब्दभ्यो विविक्तां
कृतवन्तः । मन्त्रे घसेति च्लेर्लुकि सत्यक्रतेति रूपम् । अत्रा सखाय इति । ऋचि
तुनुघेति दीर्घः । सखायः समानख्यातयो भेदग्रहस्य निवृत्तत्वात्सर्वमेकमिति मन्यन्ते ।
सख्यानीति । सायुज्यानीत्यर्थः । एकगम्य इति । ज्ञानेनैव प्राप्यः । वाचीति ।
वेदाख्ये ब्रह्मणि या लक्ष्मीर्वेदान्तेषु परमार्थसंविल्लक्षणोक्ता सैषां निहितेत्यर्थः ।
अनुवाद—"पवित्र से सत्तू के समान जहाँ धीर लोग मन से पुनकर वाणी
का व्याकरण करते हैं वहाँ समान ख्याति वाले मनुष्य सायुज्य का अनुभव करते हैं ।
कल्याणमयी लक्ष्मी इनकी वाणी में निहित होती है ।"
'सक्तुः' सच धातु से बना है (क्योंकि) इसे धोना कठिन होता है । अथवा
कस् धातु से आद्यन्तविपर्यय करके (क्योंकि) विकसित होता है । 'तितउ' पवित्र
(छलनी) को कहते हैं (क्योंकि) यह विस्तार वाली होती है, अथवा छिद्रों वाली
होती है । धीर (वे हैं जो) ध्यानवान् होते हैं । मनसा (का अर्थ है) प्रकृष्ट ज्ञान से ।
वाचमक्रत (अर्थात्) वाणी को व्याकृत किया ।
यहाँ समान ख्याति वाले होकर सायुज्य का अनुभव करते हैं ।
कहाँ ?
यह जो दुर्गम, एकमात्रगम्य वाणी का मार्ग है ।
वे कौन हैं ?
वैयाकरण ।
यह कैसे (कहा) ?
(क्योंकि) इनकी वाणी में कल्याणमयी लक्ष्मी निहित होती है । लक्ष्मी
(वह है जो) लक्षण करती है (अर्थात्) चमकती है (अपि च) विस्तार वाली
होती है । सक्तुमिव ।
उषा—प्रस्तुत मन्त्र व्याकरण के मोक्षजनकत्व का ज्ञापक है । छलनी से
जिस प्रकार सत्तूओं को शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार से वैयाकरण व्याकरण के