बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६१ )
स्पष्ट एवं सुघड़ होता है। एक प्रकार से देखा जाय तो हथेली के पर्वतों में और जन्म
कुण्डली के ग्रहों में किसी प्रकार का कोई विशेष अन्तर नहीं होता, इसीलिए कहा जाता
है कि हथेली की रेखाओं और पर्वतों का अध्ययन करने से व्यक्ति की जन्म-कुण्डली
बनायी जा सकती है।
पर्वतों के तीन भेद हैं :
१. सामान्य पर्वत
२. विकसित पर्वत
३. अविकसित पर्वत
यदि हथेली में पर्वत काफी ऊंचे उठे हुए मांसल, स्वस्थ और लालिमा लिये
हुए होते हैं तो वे विकसित कहलाते हैं। इसके विपरीत अविकसित पर्वत सामान्यतः
दिखाई ही नहीं देते। सामान्य पर्वत वे कहलाते हैं, जो न अविकसित की श्रेणी में आते
हैं और न जिन्हें पूर्णतः विकसित माना जा सकता है।
ग्रह, उनके अंग्रेजी नाम तथा संबंधित प्रभावों का परिचय निम्न प्रकार से है ::
१. बृहस्पति पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'जुपिटर' कहते हैं। यह सौम्य ग्रह
कहलाता है तथा यह पर्वत राज्य सेवा, इच्छाओं के प्रदर्शन आदि से संबंधित होता
है।
२. शनि पर्वत :—अंग्रेजी में इसे 'सेटर्न' कहते हैं तथा यह मननशीलता ,एकान्त-
प्रियता, रोग, चिन्ता, मशीनरी व व्यापार आदि से संबंधित है।
३. सूर्य पर्वत :—इसको अंग्रेजी भाषा में 'सन' कहते हैं। इसके माध्यम से
राज्य, मानसिक उन्नति, प्रसिद्धि, सम्मान, यश तथा विविध कला-कौशल का अध्ययन
किया जाता है।
४. बुध पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'मरकरी' कहते हैं। वैज्ञानिक उन्नति,
व्यापार, गणित संबंधी कार्य आदि तथ्यों का अध्ययन इसी ग्रह के माध्यम से किया
जाता है।
५. हर्षल पर्वत :—यह नाम अंग्रेजी का है, हिन्दी में इसे 'प्रजापति' कहते
हैं। इसका संबंध शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं से होता है।
६. नेपच्युन पर्वत :—हिन्दी में इसे वरुण ग्रह तथा अंग्रेजी में 'नेपच्युन' कहते
हैं। व्यक्ति की विद्वता, उसका व्यक्तित्व, दूसरों पर उसका प्रभाव तथा उसका पुरुषार्थ
आदि इसी पर्वत के माध्यम से जाना जाता है।
७. चन्द्र पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'मून' कहते हैं तथा हथेली में इस पर्वत
के माध्यम से कल्पना, विशालता, सहृदयता, मानसिक उत्थान तथा समुद्र पारीय
यात्राओं का अध्ययन किया जाता है।