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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

१५४ विवेक-चूड़ामणि
पड़ी। पतिके संन्यासी हो जानेपर भारती ब्रह्मलोकको जानेको उद्यत हुई,
परंतु शंकराचार्य उन्हें समझा-बुझाकर शृंगगिरि लिवा लाये और वहाँ रहकर
अध्यापनका कार्य करनेकी प्रार्थना की। कहते हैं, भारतीद्वारा शिक्षा प्राप्त
करनेके कारण ही शृंगेरी और द्वारकाके शारदा मठोंका शिष्य-सम्प्रदाय
'भारती' के नामसे प्रसिद्ध हुआ।
मध्यभारतपर विजय प्राप्तकर शंकराचार्य दक्षिणकी ओर चले और
महाराष्ट्रमें शैवों और कापालिकोंको परास्त किया। एक धूर्त कापालिक तो
उन्हींकी बलि चढ़ानेके लिये छलसे उनका शिष्य हो गया। परंतु जब वह
बलि चढ़ानेके लिये तैयार हुआ तो पद्मपादाचार्यने उसे मार डाला। उस
समय भी शंकराचार्यकी साधनाका अपूर्व प्रभाव देखा गया। कापालिककी
तलवारकी धारके नीचे भी वे समाधिस्थ और शान्त बैठे रहे। वहाँसे चलकर
दक्षिणमें तुंगभद्राके तटपर उन्होंने एक मन्दिर बनवाकर उसमें शारदादेवीकी
स्थापना की, यहाँ जो मठ स्थापित हुआ उसे शृंगेरीमठ कहते हैं। सुरेश्वराचार्य
इसी मठमें आचार्यपदपर नियुक्त हुए। इन्हीं दिनों शंकराचार्य अपनी वृद्धा
माताकी मृत्यु समीप जानकर घर वापस आये और माताकी अन्त्येष्टि-
क्रिया की। कहते हैं माताकी इच्छाके अनुसार इन्होंने प्रार्थना करके उन्हें
विष्णुलोकमें भिजवाया। वहाँसे ये शृंगेरीमठ आये और वहाँसे पुरी आकर
इन्होंने गोवर्धनमठकी स्थापना की और पद्मपादाचार्यको उसका अधिपति
नियुक्त किया। इन्होंने चोल और पाण्ड्य देशके राजाओंकी सहायतासे
दक्षिणके शाक्त, गाणपत्य और कापालिक-सम्प्रदायके अनाचारको दूर किया।
इस प्रकार दक्षिणमें सर्वत्र धर्मकी पताका फहराकर और वेदान्तकी महिमा
घोषित कर ये पुनः उत्तर भारतकी ओर मुड़े। रास्तेमें कुछ दिन बरारमें
ठहरकर ये उज्जैन आये और वहाँ इन्होंने भैरवोंकी भीषण साधनाको बंद
किया। वहाँसे ये गुजरात आये और द्वारकामें एक मठ स्थापितकर अपने
शिष्य हस्तामलकाचार्यको आचार्य पदपर नियुक्त किया। फिर गांगेय प्रदेशके
पण्डितोंको पराजित करते हुए कश्मीरके शारदाक्षेत्र पहुँचे तथा वहाँके पण्डितोंको
परास्तकर अपना मत प्रतिष्ठित किया। फिर यहाँसे आचार्य आसामके
कामरूप आये और वहाँके शैवोंसे शास्त्रार्थ किया। यहाँसे फिर बदरिकाश्रम

भगवान् शंकराचार्य और विवेक-चूडामणि १५५
वापस आये और वहाँ ज्योतिर्मठकी स्थापना कर तोटकाचार्यको मठाधीश
बनाया। वहाँसे ये केदारक्षेत्र आये और यहींसे कुछ दिनों बाद सीधे देवलोक
चले गये।
यों तो शंकराचार्यके लिखे हुए लगभग २७२ ग्रन्थ बताये जाते हैं, परंतु
यह कहना कठिन है कि वे सब उन्हींके लिखे हुए हैं। ऐसा अनुमान किया
जाता है कि इनमेंसे कुछ आचार्योंद्वारा रचित पीछेके होंगे जो पश्चाद्वर्ती
शंकराचार्यकी उपाधि धारण करनेवाले हुए और जिन्होंने अपने पूरे नाम नहीं
दिये। जो हो, प्रधान-प्रधान ग्रन्थ ये हैं—ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद् (ईश, केन,
कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक,
नृसिंहपूर्वतापनीय, श्वेताश्वतर इत्यादि ) भाष्य, गीताभाष्य, विष्णुसहस्रनामभाष्य,
सनत्सुजातीयभाष्य, हस्तामलकभाष्य, ललितात्रिशतीभाष्य, विवेकचूडामणि,
प्रबोधसुधाकर, उपदेशसाहस्री, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी, दशश्लोकी,
सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह, वाक्सुधा, पंचीकरण, प्रपंचसारतन्त्र, आत्मबोध,
मनीषापंचक, आनन्दलहरीस्तोत्र इत्यादि।
विवेक-चूडामणिका संक्षिप्त परिचय
आचार्यद्वारा रचित यद्यपि छोटे-बड़े सैकड़ों ग्रन्थ हैं, पर विवेक-चूडामणि
साधना और संक्षिप्तमें सम्यक् ज्ञानोपलब्धिकी दृष्टिसे सर्वोत्तम है। इसके
अनुसार मनुष्य-जन्म पाकर संसारको विलोप करते हुए सर्वत्र शुद्ध
भगवद्-दृष्टि प्राप्तकर सर्वथा जीवनन्मुक्त होकर कैवल्य-प्राप्ति ही सर्वोत्तम
सिद्धि है। इसी बातको उन्होंने गीताभाष्य, ब्रह्मसूत्रभाष्य आदिमें विस्तारसे
प्रतिपादित किया है। पर आचार्य कहते हैं कि यह अवस्था अनन्त जन्मोंके
पुण्यके बिना प्राप्त नहीं होती—
मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते॥
(वि०चू०म० २)
यही बात गीतामें भगवान् कृष्ण भी कहते हैं—
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
(गीता ६। ४५)

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साधनाकी दृष्टिसे भगवत्कृपाके द्वारा मोक्षकी इच्छा और तदर्थ प्रयत्न
और सत्संगकी प्राप्ति ये तीन दुर्लभ वस्तुएँ हैं। इनसे विवेककी प्राप्ति होकर
जीवन्मुक्तिकी उपलब्धि होती है। आचार्यका वचन है—
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥
(वि०चू०म० ३)
गोस्वामी तुलसीदासजीकी रचनाओंपर इनका स्पष्ट प्रभाव दीखता है—
बिनु सत्संग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
बिनु सत्संग भगति नहिं होई। ते तब मिलहिं द्रवै जब सोई॥
सत्संगति मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥
बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गावा॥
बड़े भाग पाइअ सत्संगा। बिनहिं प्रयास होइ भव भंगा॥
लगता तो यहाँतक है कि—'वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्'
इत्यादिमें निदर्शनालंकारसे गोस्वामीजीने शंकरावतार शंकराचार्यकी ही वन्दना
की है और उनके समग्र साहित्यपर आचार्यका महान् प्रभाव है और इन्हीं
कारणोंसे भाषा हिन्दी होने, भाव गम्भीर होनेके कारण मानसका विश्वमें
सर्वाधिक प्रचार हो गया।
विवेक-चूडामणिमें नित्य-समाधिके लिये वैराग्यको ही सर्वोत्कृष्ट
साधन माना गया है। आचार्य कहते हैं—'अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः'
अर्थात् अत्यन्त विरक्तको तत्काल समाधि सिद्ध होती है। गीतामें भी यही
भाव व्यक्त हुआ है।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
(गीता २।५२-५३)
विवेक-चूडामणिकी सारी उपयोगिताओंको हृदयंगम करनेके लिये
ग्रन्थका पर्यावलोकन आवश्यक है। उसे शनैः-शनैः आप रसपूर्वक मनन
करते हुए पूरा लाभ उठायें। यही निवेदन है।