विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ विवेक-चूडामणि
हे शरणागतवत्सल, करुणासागर, प्रभो ! आपको नमस्कार है। संसार-
सागरमें पड़े हुए मेरा आप अपनी सरल तथा अतिशय कारुण्यामृतवर्षिणी
कृपाकटाक्षसे उद्धार कीजिये।
दुर्वारसंसारदवाग्नितप्तं
दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः।
भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः
शरण्यमन्यं यदहं न जाने ॥ ३८ ॥
जिससे छुटकारा पाना अति कठिन है उस संसार-दावानलसे दग्ध
तथा दुर्भाग्यरूपी प्रबल प्रभंजन (आँधी)-से अत्यन्त कम्पित और
भयभीत हुए मुझ शरणागतकी आप मृत्युसे रक्षा कीजिये; क्योंकि इस
समय मैं और किसी शरण देनेवालेको नहीं जानता।
शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो
वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः।
तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जना-
नहेतुनान्यानपि तारयन्तः ॥ ३९ ॥
भयंकर संसार-सागरसे स्वयं उत्तीर्ण हुए और अन्य जनोंको भी बिना
कारण ही तारते तथा लोकहितका आचरण करते अति शान्त महापुरुष
ऋतुराज वसन्तके समान निवास करते हैं।
अयं स्वभावः स्वत एव यत्पर-
श्रमापनोदप्रवणं महात्मनाम्।
सुधांशुरेष स्वयमर्ककर्कश-
प्रभाभितप्तामवति क्षितिं किल ॥ ४० ॥
महात्माओंका यह स्वभाव ही है कि वे स्वतः ही दूसरोंका श्रम दूर