विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चिन्तनका विधान १११
आत्म-चिन्तनका विधान
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन।
अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि॥ ४०८॥
यह विकल्प चित्त-मूलक है, चित्तका अभाव होनेपर इसका कहीं नाम-
निशान भी नहीं रहता। इसलिये चित्तको प्रत्यक् चैतन्य-स्वरूप आत्मामें
स्थिर करो।
किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं
निरुपममतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्।
निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४०९ ॥
किसी नित्यबोध-स्वरूप, केवलानन्दरूप, उपमारहित, कालातीत, नित्य-
मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशके समान निःसीम, कलारहित, निर्विकल्प पूर्ण ब्रह्मका
विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव करते हैं।
प्रकृतिविकृतशून्यं भावनातीतभावं
समरसमसमानं मानसम्बन्धदूरम्।
निगमवचनसिद्धं नित्यमस्मत्प्रसिद्धं
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४१० ॥
कारण और कार्यसे रहित, मानवी भावनासे अतीत, समरस, उपमारहित,
प्रमाणोंकी पहुँचसे परे, वेद-वाक्योंसे सिद्ध, नित्य, अस्मत् (मैं) रूपसे स्थित
पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें अपने अन्तःकरणमें अनुभव करते हैं।
अजरममरमस्ताभासवस्तुस्वरूपं
स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम्।
शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥ ४११ ॥
अजर, अमर, आभासशून्य, वस्तुस्वरूप, निश्चल जल-राशिके समान,
नाम-रूपसे रहित, गुणोंके विकारसे शून्य, नित्य, शान्तस्वरूप और अद्वितीय
पूर्ण ब्रह्मका विद्वान् समाधि-अवस्थामें हृदयमें साक्षात् अनुभव करते हैं।