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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 475 में से

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पृष्ठ 8

( ५ )
अपनाये सुग्रीव विभीषण तिन न तज्यो छल-छाउ ।
‘भरत-सभा सनमानि’ सराहत होत न हृदय अघाउ ॥
[पद १००]
इसका भावार्थ आपने लिखा है ‘यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना
कपट भाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपनी शरणमें ले ही लिया । और
भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही
नहीं होती ।’ कैसा अर्थका अनर्थ हुआ है और प्रसंग कितनी दूर छूट गया
है ! इस अर्थसे तो यह सूचित हो रहा है कि सुग्रीव और विभीषणका ‘कपट’
भाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया । पर वास्तवमें बात इसकी
उलटी है । आगे देखिये, ‘भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं’,
लिखकर टीकाकारने सीतापतिके शील और स्वभावमें भी बट्टा लगा दिया है;
क्योंकि भरतजी तो इस योग्य थे ही, फिर यदि सीतापति उनकी सदा प्रशंसा
करते रहते हैं, तो इसमें सीतापतिकी कौन-सी विशेषता है ? इस अर्थसे तो कविके
कथनका प्रवाह ही टूट जाता है । जरा नीचे लिखे पदमें ऊपरके चरणोंका
मिलान कीजिये:—
सुनि सीतापति-सील-सुभाउ ।
मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥
सिसुपन ते पितु, मातु, बन्धु, गुरु, सेवक, सचिव सखाउ ।
कहत राम-बिधु बदन रिसौहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥
खेलत सङ्ग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ ।
जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥
सिला साप-सन्ताप बिगत भइ, परसत पावन पाउ ।
दई सुगति सो न हेरि हरषि हिय, चरन छुए पछिताउ ॥
भव-धनु भञ्जि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ ।
छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥
कह्यो राज बन दियो नारि बस, गरि गलानि गयो राउ ।
ता कुमातु को मन जुगवत ज्यौं, निज तनु मरम कुघाउ ॥