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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 472

( ३ )
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जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं | तुम सम दीनबन्धु, न दीन कोउ ३९९
त्यागौं ३०२ | तू दयालु, दीन हौं १६१
जौ निज मन परिहरै बिकारा २२० | ते नर नरक-रूप जीवत जग २५२
जौ पै कृपा रघुपति कृपालुकी २४६ | तो सों प्रभु जो पै कहूँ कोउ होतो २८२
जौ पै चेराई रामकी करतो न | तो सों हौं फिर फिर हित २२८
लजातो २६९ | तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ १६७
जो पै जानकीनाथ सों ३२४ | तौ हौं बार बार प्रभुहि पुकारिकै ४१२
जो पै जिय जानकिनाथ न जाने ३८७ | दनुजवन-दहन ८९
जौ पै जिय धरिहौं १८२ | दनुज-सूदन, दयासिन्धु ११५
जो पै दूसरो कोउ होइ ३६४ | दानी कहूँ संकर-सम नाहीं ४
जौ पै रहनि रामसों नाहीं ३०० | द्वार द्वार दीनता कही ४४८
जो पै रामचरन-रति होती २९२ | द्वार हौं भोर ही को आजु ३६७
जौ पै हरि जनके अवगुन गहते १८३ | दीन उद्धरन रघुवर्य १२५
जो मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु ३४४ | दीनको दयालु दानि १६०
जो मन लागै राम चरन अस ३४३ | दीन-दयालु दिवाकर देवा २
जो मोहिं राम लागते मीठे २९३ | दीन-दयालु दुरित दारिद २४९
ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं ४३७ | दीनबन्धु दूसरो कहँ पावौं ३८४
तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं १८२ | दीनबन्धु दूरि किये दीनको ४२३
तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौं ४३५ | दीनबन्धु सुखसिन्धु १६३
तब तुम मोहूँसे सठनिको ३९७ | दुसह दोष-दुख दलनि २१
ताकिहै तमकि ताकी ओरको ५६ | देखो देखो, बन बन्यो आज १९
तातें हौं बार बार देव २३० | देव दूसरो कौन दीनको दयालु २७४
ताहि ते आयौं सरन सबेरे ३१५ | देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे ९
ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो ३३३ | देहि अवलम्ब कर कमल १२२
तुम अपनायो तब जानिहौं ४३९ | देहि सतसंग निज अंग ११८
तुम जनि मन मैलो करो ४४४ | नाचत ही निसि-दिवस मन्यो १७४
तुम तजि हौं कासों कहौं ४४६ | नाथ गुन-गाथ सुनि होत ३०८