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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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४५४ विनय-पत्रिका
क्योंकि यह जीव निःसंग है, अविनाशी है। देखिये—
ईस्वर-अंश जीव अविनासी ।
चेतन अमल सहज सुख-रासी ॥
गीतामें भी कहा है:—
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
अतः जब अविनाशी जीवका नाशवान् शरीरके साथ मेल होना ही मिथ्या
है, तो फिर उसके साथ सम्बन्ध रखनेवाले कैसे मिथ्या न होंगे ? यहाँ दुर्लभ
मनुष्य-शरीरकी उपमा सुवर्णसे दी गयी है, जीवकी उपमा मणिसे, और देह-
जीव-जोगके सम्बन्धियोंकी उपमा काँचसे दी गयी है। खूब ! यहाँ मन-सहित
बाह्येन्द्रियाँ, तथा स्त्री-पुत्र, सगे-सम्बन्धी आदि ही 'देह-जीव-जोगके सखा' हैं।
२—'पाँचों'...पंचों; सब पञ्चोंका नाम गुसाईंजीने आगेके पदमें गिना
दिया है। अर्थात् हनुमान्जी, शत्रुघ्नजी, भरतजी और लक्ष्मणजी । चार ये,
और एक जगजननी जानकी-सहित स्वयं महाराज रामचन्द्रजी ।
[ २७८ ]
पवन-सुवन ! रिपु-दवन ! भरतलाल ! लखन ! दीन की ।
निज निज अवसर सुधि किये, बलि जाउँ,
दास-आस पूजि है खास खीन की ॥१॥
राज-द्वार भली सब कहैं साधु-समीचीन की ।
सुकृत-सुजस, साहिब-कृपा, स्वारथ-परमारथ,
गति भये गति-विहीन की ॥२॥
समय सँभारि सुधारिवी तुलसी मलीन की ।
प्रीति-रीति समुझाइवी नतपाल
कृपालुहि परमिति पराधीन की ॥३॥
शब्दार्थ—खीन = क्षीण, खिन्न । समीचीन = अच्छे, सच्चे । परमिति = सीमा ।
भावार्थ—हे पवनकुमार ! हे शत्रुघ्नजी ! हे भरतलाल ! हे लखनलाल !
मैं आप लोगोंकी बलैया लेता हूँ, यदि आप लोग अपने-अपने अवसरपर इस
दीनकी सुध करेंगे, तो इस निहायत खिन्न दासकी आशा पूरी हो जायगी ॥१॥