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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका ४११
[ २४१ ]
भली भाँति पहिचाने-जाने साहिब जहाँ लौं जग,
जूड़े होत थोरे, थोरे ही गरम ।
प्रीति न प्रवीन, नीति हीन, रीति के मलीन,
मायाधीन सब किये कालहू करम ॥१॥
दानव-दनुज बड़े महामूढ़ मूँड़ चढ़े,
जीते लोकनाथ नाथ बलनि भरम ।
रीझि-रीझि दिये बर, खीझि-खीझि घाले घर,
आपने निवाजे की न काहूको सरम ॥२॥
सेवा-सावधान तू सुजान समरथ साँचो,
सदगुन-धाम राम ! पावन परम ।
सुरुख, सुमुख, एकरस, एकरूप, तोहि,
बिदित बिसेषि घट घट के मरम ॥३॥
तो सौं नतपाल न कृपाल, न कँगाल मो-सौँ
दया में बसत देव सकल धरम ।
राम कामतरु-छाँह चाहै रुचि मन माँह,
तुलसी विकल, बलि, कलि-कुधरम ॥४॥
शब्दार्थ—जूड़े = शीतल, प्रसन्न । मूँड़े = सिर । घाले = नष्ट किये । मरम = मर्म ।
भावार्थ—संसारमें जहाँतक (जितने) स्वामी हैं, (सबको) मैंने अच्छी तरह
पहचान लिया और जान लिया है । वे थोड़ेमें ही प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़ेमें
क्रुद्ध । वे प्रेममें निपुण नहीं हैं, नीतिहीन हैं और रीतिमें मलिन हैं, क्योंकि काल,
कर्म एवं मायाने उन्हें अपने अधीन कर रखा है ॥१॥ अपने स्वामियोंके बलके
भ्रममें महामूर्ख बड़े-बड़े दैत्य-दानव सिरचढ़े हो गये थे और लोकपालोंको भी
जीतनेमें समर्थ हुए थे । उनके स्वामियोंने पहले तो प्रसन्न हो-होकर वर दिये और
पीछे चिढ़कर इनके घरोंका सत्यानाश कर दिया । अपने कृपा करनेकी किसीको
भी शर्म नहीं है (अर्थात्, किसीको यह ज्ञान नहीं कि लगाये हुए आमको काटना
बहुत बुरा है) ॥२॥ हे राम जी ! सेवासे सावधान, सच्चे समर्थ एवं चतुर आप