विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४०७
(ताकि अगस्त्य-ऋषि या और अन्य तपस्वी ब्राह्मण उसे खारा मानकर
आचमन न कर सकें) ॥३॥ शेष, शुकदेवजी, पण्डित तथा वेदोंने अपनी-अपनी
बुद्धिके अनुसार इसका वर्णन करते हुए कहा है कि रामनामकी महिमा अपार
है। रामनाममें प्रेम होना तुलसीके लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह राम-
नाम अज्ञानान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्य है ॥४॥
विशेष
१—'राम जपु······जवनि'—भगवान्ने स्वयं कहा है—
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः ।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि ॥
भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते ।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ॥ .
—श्रीमद्भागवत (११।२६ श्लोक । २९,३०)
अर्थात् 'जो लोग मुझमें मन लगाकर श्रद्धा और आदरके साथ मेरी नाम-
गुण-लीला-कथाको सुनते, गाते और चिन्तन करते हैं उनकी मुझमें अनन्य भक्ति
हो जाती है। मुझ अनन्त-गुण-सम्पन्न सच्चिदानन्दघन—ब्रह्ममें भक्ति हो जाने-
पर फिर उस साधु पुरुषको और कौनसी वस्तु प्राप्त करनी बाकी रह जाती है ?'
२—'कुटिल कलिमल···हरनि'—
पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशोऽब्रुवन् ।
हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥
सङ्कीर्त्यमानो भगवाननन्तः
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम् ।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः ॥
—श्रीमद्भागवत (१२।१२। श्लो. ४६-४७)
अर्थात् 'कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दुःखसे पीड़ित होते
समय परवश होकर भी ऊँचे स्वरमें 'हरये नमः' पुकार उठता है तो वह सब