विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३९९
८—'पूतरो बाँधिहै'—खेल दिखानेके बाद नट कपड़ेका बनाया हुआ
पुतला बाँसपर लटकाकर चारों ओर घुमाता है और कहता फिरता है कि देखो
यह सूम है। इससे पैसा न देनेवाले सूम उसे कुछ-न-कुछ दे देते हैं। इसी
प्रकार मैं भी पुतला बाँधकर कहता फिरूँगा कि यह सूमराज रामचन्द्रजी हैं।
[ २४२ ]
तुम सम दीनबंधु, न दीन कोउ मो सम,
सुनहु नृपति रघुराई।
मो सम कुटिल-मौलिमनि नहिं जग,
तुम सम हरि ! न हरन कुटिलाई ॥१॥
हौं मन बचन-करम पातक-रत,
तुम कृपालु पतितन-गति दाई।
हौं अनाथ, प्रभु ! तुम अनाथ-हित,
चित यहि सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥२॥
हौं आरत, आरति-नासक तुम,
कीरति निगम-पुराननि गाई।
हौं सभीत तुम हरन सकल भय,
कारन कवन कृपा बिसराई ॥३॥
तुम सुखधाम राम श्रम-भंजन,
हौं अति दुखित त्रिबिध श्रम पाई।
यह जिय जानि दास तुलसी कहँ,
राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥४॥
शब्दार्थ—मौलिमनि = शिरोमणि । सुरभि = सुध । आरति = दुःख । स्रम = श्रम,
त्रिविध श्रम, दैहिक, दैविक और भौतिक ।
भावार्थ—हे रामजी, सुनिये ! आपके समान दीनबन्धु और मेरे समान
दीन दूसरा कोई नहीं है। हे प्रभो ! न तो संसारमें मेरे समान कोई दुष्ट-शिरोमणि
है, और न आपके समान कोई दुष्टताका हरण करनेवाला है ॥१॥ मैं मन,
वचन और कर्मसे पाप-रत हूँ, और आप कृपालु हैं, पापियोंको सद्गति देनेवाले