विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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६—‘सुरपति’—इन्द्रके नाना प्रकारके घोर पापोंकी कथाएँ पुराणोंमें लिखी
हुई हैं। यथा—इन्द्रने मदान्ध होकर ऋषि-पत्नी अहल्याके साथ प्रसङ्ग किया
था आदि।
७—‘गनिका’—९४ पदके विशेषमें देखिये।
८—‘कन्दर्प’—कृष्णभगवान्के पुत्र प्रद्युम्न कामदेवके अवतार थे।
९—इसी भावका पद सूरदासका भी देखिये:—
जाको मनमोहन अङ्ग कस्यो।
ताको केस खस्यो नहिं सिर तें, जो जग बैर पर्यो ॥
हिरनकसिपु परिहारि थक्यो प्रहलाद न नेकु डर्यो।
अजहूँ तौ उत्तानपाद-सुत राज करत न मर्यो॥
राखी लाज द्रुपद-तनया की कोपित चीर हर्यो।
दूरजोधनको मान भंग करि बसन प्रवाह भर्यो ॥
विप्र भक्त नृग अन्धकूप दिप बलि पढ़ि वेद छर्यो।
दीनदयालु कृपानिधि की गति कापै कह्यो पर्यो ॥
जा सुरपति कोप्यो ब्रज उपर कहिधौं कछु न सर्यो।
राखे ब्रजजन नंदके लाला गिरिधर विरद धर्यो ॥
जाको विरद है गर्व प्रहारी सो कैसे बिसर्यो।
सूरदास भगवन्त भजन करि सरन गहे उधर्यो ॥
महात्मा सूरदास।
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सोइ सुकृती, सुचि साँचो जाहि राम! तुम रीझे।
गनिका, गीध, बधिक हरिपुर गये,
लै करसी प्रयाग कब सीझे ॥१॥
कबहुँ न डिग्यो निगम-मग तें पग,
नृग जग जानि जिते दुख पाये।
गजधौं कौन दिछित, जाके सुमिरत
लै सुनाम बाहन तजि धाये ॥२॥