विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३८९
गोस्वाम़ीजीने कवितावलीमें भी लिखा है—
कलु कामसे रूप प्रताप दिनेससे सोमसे सील गनेससे माने ।
हरिचंदसे साँचे बड़े विधिसे मघवासे महीप विषै सुख साने ।
सुकसे मुनि सारदासे बकता चिर जीवन लोमसतें अधिकाने ।
तउ ऐसे भये तो कहा तुलसी जो पै राजिवलोचन राम न जाने ॥
२—'बिप'-अजामिल; ५७ पदके 'विशेष'में देखिये ।
३—'बधिक'—व्याध, ९४ पदके विशेषमें देखिये ।
४--'गज'-८३ पदके विशेषमें देखिये ।
५—'गीध' -२१५ पदके विशेषमें देखिये ।
६—'मेरुसे•••••आने'— श्रीरामजीके स्वभावका चित्र पृष्ठ संख्या १५२ में
देखिये । 'सुनि सीतापत्ति-सीलसुभाउ' ।
[ २३७ ]
काहे न रसना, रामहि गावहि ?
निसिदिन पर-अपवाद वृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि ॥१॥
नरमुख सुन्दर मन्दिर-पावन बसि जनि ताहि लजावहि ।
ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत रविकर-जल कहँ धावहि ॥२॥
काम-कथा कलि-कैरव-चंदिनि, सुनत श्रवन दै भावहि ।
तिनहि हटकि कहि हरि-कल-कीरति, करन कलंक नसावहि ॥३॥
जातरूप मति, जुगुति रुचिर मनि रचि-रचि हार बनावहि ।
सरन-सुखद रविकुल-सरोज-रबि राम-नृपहि-पहिरावहि ॥४॥
बाद-विवाद, स्वाद तजि भजि हरि, सरस चरित चित लावहि ।
तुलसिदास भव तरहि, तिहूँ पुर तू पुनीत जस पावहि ॥५॥
शब्दार्थ—ससि = चन्द्रमा । कैरव = कुमुदिनी । भावहि = भाता है । हटकि = रोककर ।
करन = कर्ण, कान । जातरूप = सुवर्ण ।
भावार्थ—जीभ ! तू श्रीरामजीका गुण-गान क्यों नहीं करती ? क्यों रात-
दिन दूसरोंकी निन्दा कर-करके व्यर्थ ही राग-द्वेष बढ़ा रही है ? ॥१॥ मनुष्यके
मुखरूपी सुन्दर और पवित्र मन्दिरमें रहकर उसे लज्जित न कर । चन्द्रमाके पास