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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 393, कुल 475 में से

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पृष्ठ 393

कुटिल कोल-भील, बन्दर और रीछ आदिका पालन करना और किस कृपालुको
शोभा देता है ? ॥२॥ क्रोध और आलस्यके साथ भी किसका नाम लेनेसे पाप
और दुर्गुण दूर हो जाते हैं ? किसने तुलसी-सरीखे बुरे सेवकका संग्रह किया है
(अपनाया है), जो दुष्ट सदा अपने स्वामीसे द्रोह किया करता है ? ॥३॥
विशेष
१—'चहत सब स्वारथ'—इसपर और भी कहा है :—
'स्वारथके सब ही सगे, बिनु स्वारथ कोउ नाहिं ।
सेवैं पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ॥'
२—'काको······बिछोहै'—यही बात गुसांईजीने रामचरितमानसमें
भी कही है—
'भाव कुभाव अनख आलसहू । नाम जपत मंगल दिसि दसहू ॥'
ईश्वराराधन किसी भी भावसे क्यों न किया जाय, हर हालतमें वह
कल्याणकारी ही होता है । बुरे भावसे साधन करना भी कल्याणप्रद हो जाता
है । महाभारतमें एक कथा है जो कि इस प्रकार है—एक मेहतर था जो किसी
राजाके यहाँ पाखाना साफ करता था । एक दिन उसकी नजर रानीपर पड़ गयी ।
परिणाम यह हुआ कि वह रानीको पानेके लिए बीमार पड़ गया । रानी भी
उसका भाव ताड़ गयी । कई दिनोंके बाद रानीने मेहतरकी स्त्रीसे पूछा, आजकल
तेरा पति क्यों नहीं दिखाई पड़ता ? उसने कहा, बीमार है । रानीने बीमारी-
का हाल पूछा और आश्वासन देकर सच बात बतानेके लिए कहा । मेहतरानीने
सब हाल कह सुनाया । रानीने कहा, उससे कहो कि वह जंगलमें जाकर खूब
साधना करे । जब वह ऐसा अभ्यास करके यहाँ आवे कि महीनों बिना अन्न-
जलके एक आसनसे रह सके, तब उसकी ख्याति सुनकर मैं भी उसका दर्शन
करने जाऊँगी । उसी समय उससे भेंट हो सकेगी । मेहतर अपनी स्त्रीसे यह
समाचार पाकर स्वस्थ हो गया और रानीसे मिलनेकी आशासे तप करनेके लिए
जङ्गलमें चला गया । कुछ दिनोंके बाद अभ्यास बढ़ाकर वह राजाकी पुरीमें
आया । उसकी अपूर्व साधनाका हाल सुनकर राजा भी उसका दर्शन करने गये
और पीछे उन्होंने अपनी रानीको भी उसके पास दर्शनार्थ भेजा । रानीने उसे