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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका ३६७
[ २१९ ]
द्वार हौं भोर ही को आजु ।
रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥१.
कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु ।
नीच जन, मन ऊँच, जैसी कोढ़ में की खाजु ॥२॥
हहरि हिय में सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु ।
मोहूँ से कहूँ कतहूँ कोउ, तिन्ह कह्यो कोसलराजु ॥३॥
दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाजु ।
दानि दसरथराय के, तू बानइत सिरताजु ॥४॥
जनम को भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु ।
पेट भरि तुलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु ॥५॥
शब्दार्थ—रिरिहा = रिरियाने या गिड़गिड़ानेवाला । आरि = किनारा, घाट ।
हहरि = हारकर । सदय = कृपालु । बाजु = बिना, छोड़कर । बानइत = बाणैत, बानावाला ।
सुनाजु = सुन्दर अनाज, अच्छा भोजन ।
भावार्थ—आज मैं भोरहीसे दरवाजेपर हूँ और गिड़गिड़ाकर रट लगा
रहा हूँ कि मेरे लिए और कोई घाट या जगह नहीं है, मुझे केवल कौरसे ही
(भोजनसे ही) काम है ॥१॥ यह विकराल कलियुग दारुण दुर्भिक्ष रूप है;
इसमें सब उपाय अथवा साधन बुरे हो गये हैं और कुसंग अर्थात् मन, बुद्धि
इन्द्रिय आदिका व्यापार भी बुरा हो गया है। नीच आदमी हूँ और ऊँचा मन है;
यह ठीक वैसे ही है, जैसे कोढ़ रोगमें खुजली । (अर्थात् जिस प्रकार कुष्ठ रोगमें
खाज होनेपर न तो बिना खुजलाये रहा जाता है और न खुजलानेसे ही काम
चलता है; क्योंकि खुजलाते ही कोढ़के घाव भभाने लगते हैं; उसी प्रकार नीच
मनुष्यका ऊँचा मन भी है) ॥२॥ हृदयमें हार मानकर मैंने कृपालु-समाजमें
जाकर पूछा कि कहिये तो सही मुझ सरीखोंके लिए भी कहीं कोई है ? साधु-
समाजने कहा, कोशलेन्द्र श्रीरामजी हैं ॥३॥ कृपासागर भगवान् रामजीको
छोड़कर दूसरा कौन दीनता और दरिद्रताका नाश कर सकता है ? अतः हे
गरीब-निवाज, दशरथलला ! आप बाणैत-शिरोमणि और दानी हैं ॥४॥ और मैं