सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 376

विनय-पत्रिका ३६५
भावार्थ—हे नाथ ! यदि दूसरा कोई (आपके समान) होता, तो मैं बार-
बार रोकर अपना दुःख आपहीको क्यों सुनाता ? ॥१॥ (आपके सिवा) दीनों-
पर किसकी स्नेह-ममता है, और पतित-पावन किसका नाम है ? महापापी अजा-
मिलको किसने अपना धाम दिया ? ॥२॥ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और अनेक लोक-
पाल थे, पर शोकरूपी नदीमें डूबते हुए गजेन्द्रको किसीने सहारा नहीं दिया॥३॥
सभामें बहुतसे रजवाड़े बैठे थे और सभी अपने-अपनेको समर्थ थे, किन्तु जब
अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने कहा, 'प्रभो ! मेरी रक्षा करो'—तब किसीने उसे वस्त्र
नहीं दिया (यदि उसकी साड़ी बढ़ायी, तो आपहीने ।) ॥४॥ मैं करुणा-
निधान भगवान् रामजीकी गुग-गाथा एक मुखसे कैसे कहूँ ? हे कोशलनाथ !
आपने भक्तोंके लिए अवतार लेकर क्या-क्या नहीं किया ? ॥५॥ यदि आप
मुझसे घृणा करते हों तो आप मुझे अपने ही समान किसी स्वामीको सौंप
दीजिये । (यदि आप ऐसा न करेंगे तो) यह दास तुलसी आपके चरणोंको
छोड़कर और किसी प्रकार भला अन्यत्र क्यों जाने लगा ? ॥६॥
विशेष
१—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये ।
२—'करीस'—गजेन्द्र; ८३ पदके विशेषमें देखिये ।
३—'नर-नारि'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये ।
२१८ ]
कबहिं देखाइहौ हरि चरन ।
समन सकल कलेस कलि-मल, सकल मंगल-करन ॥१॥
सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज बरन ।
लच्छि-लालित ललित करतल छवि अनूपम धरन ॥२॥
गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन ।
विप्रतिय नृग बधिक के दुख-दोस दारुन दरन ॥३॥
सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन ।
सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन तरन ॥४॥