विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकोमल, दीन-हितकारी और सदैव दान देनेवाले हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! तू
कुटिलता और कपट न रखकर ऐसे प्रभु (श्री रामजी) का भजन कर ॥७॥
विशेष
१—'निषाद'—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
२—'गीध'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके
प्राण-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान, इसका दाह-संस्कार
किया था।
३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
[ २१६ ]
हरि तजि और भजिये काहि ?
नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि ॥१॥
कनककसिपु बिरंचि को जन करम मन अरु बात ।
सुतहि दुखवत विधि न बरज्यो काल के घर जात ॥२॥
संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिय दससीस ।
करत राम-विरोध सो सपनेहुँ न हरक्यो ईस ॥३॥
और देवन की कहा कहौं, स्वारथहि के मीत ।
कबहुँ काहु न राखि लियो कोउ सरन गयउ सभीत ॥४॥
को न सेवत देत संपति लोकहू यह रीति ।
दास तुलसी दीनपर एक राम ही की प्रीति ॥५॥
शब्दार्थ—कनककसिपु = हिरण्यकशिपु । हरक्यो = मना किया । ईस = शिवजी ।
भावार्थ—परमात्माको छोड़कर और किसका भजन किया जाय । रामजी-
की तरह ऐसा कोई नहीं है, जिसकी भक्तोंपर ममता हो ॥१॥ हिरण्यकशिपु मन,
वचन और कर्मसे ब्रह्माका भक्त था। वह अपने पुत्र (प्रह्लाद) को दुःख पहुँचाने-
के कारण, कालके घर चला गया, पर ब्रह्मा उसे न रोक सके (मृत्युसे न बचा
सके) ॥२॥ संसार जानता है कि रावण शिवजीका भक्त था और उसने कई
बार अपने सिर काटकर शिवजीको चढ़ाये थे। किन्तु जब वह रामजीसे वैर करने