विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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पता लगाकर उस ब्राह्मणके पास पहुँचा और उसे चोर समझकर गायके लिए
झगड़ा करने लगा । अन्तमें दोनों राजाके पास गये । राजाके राजी करनेपर
भी वे दोनों ब्राह्मण राजी नहीं हुए और गाय छोड़कर यह शाप देते हुए चले
गये कि 'तुमने हमें धोखा दिया है, इसलिए तुम गिरगिट हो जाओ । विप्रका
शाप सत्य हुआ । बेचारे राजा बहुत दिनोंतक, द्वारकाके एक कुएँमें पड़े रहे। कहा
भी है, 'कोटि गऊराजा नृग दीन्हें तेउ भव-कूप परे ।' भगवान्ने कृष्णावतारमें
उस गिरगिटको कुएँसे निकाला और दिव्य शरीर देकर वैकुण्ठमें भेज दिया ।
राग कल्याण
[ २१४ ]
ऐसी कौन प्रभुकी रीति ?
बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥१॥
गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ ।
मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥२॥
काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह ।
जगत-पिता विरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥३॥
नेम तें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि ।
कियो लीन सु आपुमें हरि राज-सभा मँझारि ॥४॥
ब्याध चित दै चरन माऱ्यो मूढ़मति मृग जानि ।
सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥५॥
कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ ।
प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥६॥
शब्दार्थ—पाँवरनि = नीचों । कुच = स्तन । कालकूट = विष । जादवराइ = श्रीकृष्ण
मँझारि = बीचमें । चित दै = निशाना साधकर । बानि = आदत, स्वभाव ।
भावार्थ—ऐसी रीति और किस प्रभुकी है जो अपने बाने (की लाज
रखने) के लिए पवित्र पुरुषों (ऋषियों) को छोड़कर नीचों (शबरी, चांडाल
आदि) पर प्रेम करता हो ? ॥१॥ पूतना अपने स्तनोंमें विष लगाकर मारने