विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि,
अधम चाचरन कछु हृदय नहिं धरहुगे।
दीन हित अजित सरबग्य समरथ प्रनत-
पाल चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥
मोह मद मान कामादि खल-मंडली
सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे।
जोग-जप-जग्ग बिग्यान ते अधिक अति,
अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥३॥
मंदजन-मौलिमनि सकल साधन-हीन,
कुटिल मन मलिन जिय जानि जो डरहुगे।
दास तुलसी बेद-बिदित बिरुदावली
बिमल जस नाथ ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥४॥
शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण, अजामिल । मृदुल = कोमल । मौलिमनि = शिरोमणि ।
कुटिल = दुष्ट, विकारी । मलिन = पापी । बिरुदावली = गुणावली ।
भावार्थ—हे रघुवंशमणि ! क्या कभी आप मुझपर वह कृपा करेंगे जिस
कृपासे व्याध, गजेन्द्र, अजामिल आदि दुष्ट मनुष्य तरे थे ? हे नाथ ! क्या आप
उन लोगोंके समान मुझे भी मानकर मेरा उद्धार करेंगे ? ॥१॥ बहुतसी योनियोंमें
जन्म लेकर मैंने नाना प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं; किन्तु आप मेरे नीच आचरण-
को हृदयमें न लाइयेगा । आप दीनोंके हितू, अजेय, सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान और
प्रणतपाल हैं ! क्या आप अपने कोमल चित्तसे अपने (इन नामोंके) गुणोंका
अनुसरण करेंगे ? अर्थात् आप दीनोंके हितू हैं, अतः क्या मुझ दीनका हित न
करेंगे ? आप अजेय हैं, अतः क्या मेरे काम-क्रोधादि शत्रुओंको परास्त न करेंगे ?
आप सर्वज्ञ हैं, अतः क्या मेरे हृद्गत भावोंको न समझेंगे ? आप समर्थ हैं, अतः
क्या मुझ अधर्मीको अपने सामर्थ्यसे न तारेंगे ? आप प्रणतपाल हैं, अतः क्या
मुझ शरणागतका पालन न करेंगे ? ॥२॥ क्या आप (मेरे हृदय-स्थित)
मोह, मद, मान, काम आदि दुष्टोंकी मण्डलीको उनके परिवार-सहित समूल
नष्ट करके मेरे असह्य दुःखोंको दूर करेंगे ? क्या आप योग, जप, यज्ञ और