विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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चित्तमें अभिमानकी गाँठ पड़ी रहनेके कारण समझ-बूझकर भ्रममें पड़ जाता
हूँ ॥४॥ हे राजन् ! घोर संसाररूपी अन्धकूपमें पड़ा हुआ मैं (सब तरहसे) नरक-
का ही अधिकारी हूँ। यदि मुझे किसी बातका बल है, तो बस आपहीका ।
(आपहीके भरोसे) यह तुलसीदास निषाद, गीध और हनुमान्की जातिका स्मरण
करके अपने मनमें उसका (संसारान्धकूप या नरकमें पड़नेका) भी भय नहीं
मानता ॥५॥
विशेष
१—'गुह'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये ।
२—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये ।
३—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये ।
[२१०]
और कहँ ठौर रघुवंस - मनि ! मेरे ।
पतित-पावन प्रनत-पाल असरन - सरन,
बाँकुरे बिरद बिरुदैत केहि केरे ॥१॥
समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो,
करत नहिं कान बिनती बदन फेरे ।
तदपि है निडर हौं कहौं करुना-सिन्धु,
क्यौंडव रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥२॥
मुख्य रुचि होत बसिबेकी पुर रावरे,
राम ! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे ।
अगम अपबर्ग, थरु सर्ग सुकृतैकफल,
नाम - बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥३॥
कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ !
दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे ।
दास तुलसिहिं बास देहु अब करि कृपा,
बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥४॥