विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३३७
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श्री हरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान।
जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥१॥
परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलत अति दूरि।
जद्यपि निकट हृदय निज रहें सकल भरिपूरि ॥२॥
दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मण्डल धीर।
विगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥३॥
तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुन्द।
गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द ॥४॥
चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित अहंकार।
विमल बिचार परम पद निज सुख सहज उदार ॥५॥
पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गन्ध अरु रूप।
इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥६॥
छठ षटबरग करिय जय जनक-सुता-पति लागि।
रघुपति-कृपा-वारि बिनु नहिं बुताइ-लोभागि ॥७॥
सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार।
तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥८॥
आठइँ आठ प्रकृति-पर निरविकार श्रीराम।
केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥९॥
नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह।
ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुख लीन्ह ॥१०॥
दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि।
साधन वृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥११॥
एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ।
सोइ व्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥१२॥
द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक।
परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥१३॥
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