सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

विनय-पत्रिका ३३५
किये। तूने गर्भवासके महान् दुःख, तीव्र यातना और विपत्तिको भुला दिया;
तभी तो ऐसा कर रहा है ! यदि उस कष्टकी तुझे जरा भी सुध होती तो क्या तू
फिर वही यंत्रणा भोगनेका काम करता ? (कभी नहीं) ॥३॥ यों तो संसारमें
जिसने जन्म लिया है, सबमें भय, निद्रा, मैथुन, आहार आदि एक-से हैं; किन्तु
तूने देवताओंके लिए दुर्लभ मानव-शरीर धारण करनेपर भी ईश्वर-भजन नहीं
किया, मद और अभिमानमें चूर होकर उसे खो दिया (ऐसी दशामें तुझमें और
संसारके इतर-प्राणियोंमें अन्तर ही क्या रहा ?) ॥४॥ यदि अपने-परायेकी बुद्धि
न गयी, और शुद्ध भावसे रामजीमें प्रीति न की, तो तुलसीदास कहते हैं कि
यह अवसर बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या (लाभ) होगा ? ॥५॥
विशेष
१—'भय निद्रा ॰॰॰॰जाये'—इस विषयमें लिखा है-
'आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥
—महाभारत, शान्तिपर्व
अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन, मनुष्यों और पशुओंके लिए समान
ही स्वाभाविक है। उनमें भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन्हें मर्यादित
करनेका) । इस धर्मसे हीन मनुष्य पशुके समान ही है।
[ २०२ ]
काजु कहा नरतनु धरि साध्यो ।
पर-उपकार सार स्रुति को जो, सो धोखेहु न विचार्यो ॥१॥
द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरैं न टाऱ्यो ।
राम भजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निबाऱ्यो ॥२॥
संसय-सिंधु नाम-बोहित भजि निज आतमा न ताऱ्यो ।
जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हाऱ्यो ॥३॥
देखि आनकी सहज सम्पदा द्वेष-अनल मन-जाऱ्यो ।
सम, दम, दया दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभाऱ्यो ॥४॥