विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ विनय-पत्रिका
परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई।
कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥२॥
जहँ जहँ चित चितवत हित, तहँ नित नव विषाद् अधिकाई।
रुचि-भावती भभरि भागहिं, समुहाहिं अमित अनभाई ॥३॥
आधि-मगन मन, व्याधि-विकल तन, वचन मलीन झुठाई।
एतेहुँ पर तुमसों तुलसी की प्रभु सकल सनेह सगाई ॥४॥
शब्दार्थ-सुरपुर = देवलोक, स्वर्ग । विषाद् = दुःख । भभरि = डरकर । अनभाई =
बुरी ।
भावार्थ—हे राम गुसाइँ ! मैं आपपर बलि जाता हूँ, आप अपने स्वभावके
अनुकूल मुझपर कृपा कीजिये ॥१॥ परमार्थके, स्वर्गके साधनोंको एवं सुख देने-
वाले और भलाई करनेवाले इहलौकिक स्वार्थोंको तथा सुन्दर चालोंको इस
कलियुगने क्रोधके साथ अपनी कठिन कुचालें चलाकर लोप कर दिया है ॥२॥
यह मन जहाँ-जहाँ अपना हित देखता है, वहाँ-वहाँ नित्य नये दुःखोंकी अधिकता
है । रुचिको अच्छी लगनेवाली बात डरकर भाग जाती है, और रुचिके प्रतिकूल
अगणित वस्तुएँ सामने आती हैं ॥३॥ मन चिन्ता-मग्न हो रहा है, शरीर रोगसे
विकल है और वाणी झुठाईके कारण मलिन हो रही है । हे प्रभो ! इतनेपर भी
इस तुलसीदासका सब सम्बन्ध और स्नेह आपहीके साथ है ॥४॥
( १९६ )
काहे को फिरत मन, करत बहु जतन,
मिटै न दुख विमुख रघुकुल-वीर ।
कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिबिध ताप न जाइ,
कह्यो जो भुज उठाय मुनिवर कीर ॥१॥
सहज टेव विसारि तुही धौं देखु बिचारि,
मिलै न मथत वारि घृत बिनु छीर ।
समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम,
सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥२॥