विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २५५
'करहु हृदय अति विमल बसहिं हरि', कहि कहि सबहि सिखावौँ ।
हौं निज उर अभिमान-मोह-मद, खल-मण्डली बसावौँ ॥५॥
जो तनु धरि हरिपद साधहिं जन, सो बिनु काज गँवावौँ ।
हाटक-घट भरि धर्यो सुधा गृह, तजि नभ कूप खनावौँ ॥६॥
मन-क्रम बचन लाइ कीन्हें अघ, ते करि जतन दुरावौँ ।
पर-प्रेरित इरषा वस कबहुँक किय कछु सुभ, सो जनावौँ ॥७॥
बिप्र-द्रोह जनु बाँट पर्यो, हठि सबसों बैर बढ़ावौँ ।
ताहू पर निज मति-विलास सब संतन माँझ गनावौँ ॥८॥
निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौँ ।
तौ न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावौँ ॥९॥
जो करनी आपनी विचारौं, तौ कि सरन हौं आवौँ ।
मृदुल सुभाव सील रघुपति को, सो बल मनहिं दिखावौँ ॥१०॥
तुलसिदास प्रभु सो गुन नहिं, जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौँ ।
नाथ-कृपा भव-सिंधु धेनुपद-सम जो जानि सिरावौँ ॥११॥
शब्दार्थ—अंजन-केस = अगिन । तावाँ = मूँदता हूँ, बन्द करता हूँ। भेक = मेढक ।
गवावौँ = खो रहा हूँ। हाटक = सुवर्ण । दुरावौँ = छिपाता हूँ। बाँट = हिस्से । रिझावौँ =
प्रसन्न कर सकूँ । सिरावौँ = सन्तोष कर लेता हूँ ।
भावार्थ—हे कृपानिधि राम ! मैं सकुच रहा हूँ, आपको अपनी विनती
कैसे सुनाऊँ । हे नाथ ! मैं सब काम धर्म-विरुद्ध करता हूँ, ऐसी दशामें भला
मैं किस प्रकार आपको अच्छा लगूँगा ? ॥१॥ यद्यपि यह मैं जानता हूँ कि
संसारमें जड़-चैतन्य जितने भी प्राणी हैं, सब परमात्माके स्वरूप हैं, तथापि मैं
जबर्दस्ती उन्हें (ईश्वररूपमें) नहीं देखता। मैं तो अपने नेत्र-रूपी पतंगोंको युवती-
रूपी अग्नि-शिखामें (जलनेके लिए) भेजता हूँ ॥२॥ आपकी कथा सुननेमें ही
कानोंकी सार्थकता है, यह मैं समझता हूँ और दूसरोंको भी यही समझाता
हूँ; किन्तु उन कानोंसे मैं निरन्तर और दूसरोंके दोष सुन-सुनकर, उसे
उन्हीं (दूसरेके दोषों) से भर-भरकर बन्द करता हूँ (जिसमें वे निकलने न
पावें) ॥३॥ जिस जीभसे आपके गुण गाकर मैं बिना परिश्रमके ही परमानन्द
पा सकता हूँ, उस मुखसे मेढककी तरह दूसरोंकी बुराइयाँ रट-रटकर अपना