विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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इसपर उक्त प्रतिके टीकाकारने टिप्पणी लिखी है—'पांडवनै' पाठ ही शुद्ध है।
पांडुतनै पाठ कर देनेवालोंने भूल की है। अवधीमें पांडवका बहुवचन कर्म-
कारकका शुद्ध रूप है 'पांडवनहिं' या 'पांडवनै' । 'पांडवन्हि' भी लाघवसे
बनता है, परन्तु यहाँ एक मात्रा उससे अधिक होनी चाहिये थी।'
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कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक ! धरिहौ नाथ सीस मेरे।
जेहि कर अभय किये जन आरत, बारक बिवस नाम टेरे ॥१॥
जेहि कर-कमल कठोर संभुधनु भंजि जनक-संसय मेट्यो।
जेहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीति केवट भेंट्यो ॥२॥
जेहि कर-कमल कृपालु गीध कहँ, पिंड देइ निज धाम दियो।
जेहि कर वालि बिदारि दास-हित, कपि कुल-पति सुग्रीव कियो ॥३॥
आयो सरन सभीत विभीषन, जेहि कर-कमल तिलक कीन्हों।
जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभय दान देवन्ह दीन्हों ॥४॥
सीतल सुखद छाँह जेहि करकी, मेटति पाप, ताप, माया।
निसि-बासर तेहि कर-सरोज की, चाहत तुलसिदास छाया ॥५॥
शब्दार्थ—बारक = एक बार । हति = मारकर ।
भावार्थ—हे रघुकुल-नायक ! हे नाथ ! क्या आप कभी अपने उस कर-
कमलको मेरे मस्तकपर रखेंगे, जिस हाथसे, विवश होकर एक बार पुकारते ही
आपने आर्त्त जनोंको अभय कर दिया था ? ॥१॥ आपने जिस हस्त-कमलसे
शिवजीके कठोर धनुषको तोड़कर महाराज जनकका संशय दूर किया था, और
जिस कर-कमलसे केवट निषादको भाईकी तरह उठाकर बड़े प्रेमसे सीनेसे
लगाया था ॥२॥ हे कृपालु ! आपने जिस कर-कमलसे जटायु गीधको पिण्डदान
देकर उसे अपने साकेत धाममें भेज दिया था, और जिस हाथसे अपने सेवककी
भलाईके लिए बालिको मारकर, सुग्रीवको वानर-वंशका राजा बनाया था ॥३॥
आपने जिस कर-कमलसे भयभीत होकर शरणमें आये हुए विभीषणका राज्या-
भिषेक किया था, तथा जिस हाथसे 'धनुष-बाण लेकर, असुरोंको मारकर
देवताओंको अभय दान दिया था ॥४॥ जिस हाथकी शीतल और सुखद छाया