विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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६
बाल्यावस्थामें तुझे जितने दुःख मिले, वे इतने अधिक हैं कि गिनाये नहीं
जा सकते। क्षुधा और रोगकी भारी बाधा खड़ी हुई। तेरी वेदनाको माताने
न जाना। तेरी उस पीड़ाको माता नहीं जान पाती कि बच्चा किस कारणसे रो
रहा है। वह (तेरे हितकी दृष्टिसे) अनेक तरहके ऐसे उपाय (उलटा उपचार)
करती है, जिससे तेरी छाती अधिकाधिक जलती है। शैशव, कौमार और
किशोरावस्थाके तेरे अपार अघों (दुःखों) को कौन कह सकता है ? रे निर्दय !
महाखल ! तू ही कह, कि (उन दुःखोंको) तेरे अतिरिक्त दूसरा कौन सह
सकता है ?
७
उसके बाद तेरा यौवनकाल आया। तब तू महान् मोहके मदमें मतवाला
हो गया और युवतीके साथ रस-रंगमें फँस गया। इससे तूने धर्मकी मर्यादा
छोड़ दी। उस समय तू पहलेके सब दुःखोंको भूल गया। पिछले दुःखोंके
भूल जाने और आगेके संकटोंको समझकर तेरी छाती नहीं फट जाती ? फिर
तूने वही काम किया जिससे तुझे गर्भगत आवर्त्तमें (गर्भवास होना, जन्म होना,
मरण होना इस प्रकार घूमना, अथवा गर्भके गढ़ेमें) या संसारचक्रमें पड़नेकी
नौबत आवे। जिस शरीरका (अन्तिम) परिणाम कृमि होना, राख होना या
बीट (मल) होना है, (अर्थात्, मरनेके बाद यदि शरीर सड़ जाता है तो कीड़ोंके
रूपमें बदल जाता है, जला दिया जाता है तो राखके रूपमें हो जाता है और
यदि जीव-जन्तु खा जाते हैं तो विष्ठा बन जाता है), उसीके लिए तू संसारका
बैरी बना। दूसरेकी स्त्री, दूसरेके धन का लोभ तथा दूसरोंसे द्रोह यही सब
संसारमें प्रतिदिन नया-नया बढ़ता जाता है।
८
देखते ही देखते बुढ़ापा आ गया। जिस बुढ़ापेको तूने स्वप्नमें भी नहीं
बुलाया था उस बुढ़ापेके गुण कुछ भी नहीं कहे जा सकते। उसके गुणोंको
अब तू अपने शरीरमें ही प्रकट रूपसे (प्रत्यक्ष) देख ले। वे गुण प्रत्यक्ष हैं।
वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, रोग और शूल सता रहे हैं, सिर हिल
रहा है, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट हो गयी है, तेरा बोलना किसीको नहीं भाता।