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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 221

२१० विनय-पत्रिका
करुणाके निर्मल विवेक (ज्ञान) नहीं होता और विवेक हुए बिना इस घोर संसार-
सागरसे कोई भी पार नहीं जा सकता ॥५॥
विशेष
१—'घृत पूरन······पावै'—कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ इस प्रकार
लिखा है; "प्रतिबिम्बके औटानेसे आकाशके चन्द्रमाका नाश नहीं होता तथा
वृक्षके काटनेसे उसके कोटरमें रहनेवाला पक्षी नहीं मर जाता, वैसे ही······"
२—'साधन······तैसे'—वियोगी हरिजीने लिखा है, 'बिना आत्मज्ञानके
मन शुद्ध होनेका नहीं।' अर्थात् आत्मज्ञान होनेके बाद मन शुद्ध होता है।
किन्तु यह बात बिलकुल ही असंगत है। क्योंकि मनकी शुद्धि हुए बिना तो
आत्मज्ञान होता ही नहीं।
( ११६ )
माधव ! असि¹ तुम्हारि यह माया ।
करि उपाय पचि मरिय, तरिय नहिं, जब लगि करहु न दाया ॥१॥
सुनिय, गुनिय, समुझिय, समुझाइय, दसा हृदय नहिं आवै ।
जेहि अनुभव बिनु मोह-जनित भव दारुन विपति सतावै ॥२॥
ब्रह्म-पियूष मधुर शीतल जो पै मन सो रस पावै ।
तौ कत मृगजल-रूप विषय कारन निसि-वासर धावै ॥३॥
जेहि के भवन विमल चिन्तामनि, सो कत काँच बटोरै ।
सपने परवस परै, जागि देखत केहि जाइ निहोरै ॥४॥
ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीं ।
तुलसिदास हरि कृपा मिटै भ्रम, यह भरोस मन माहीं ॥५॥
शब्दार्थ—पियूष = अमृत । चिन्तामनि = चिन्ताओंको दूर करनेवाला स्वर्गका
एक रत्न ।
भावार्थ—हे माधव ! तुम्हारी यह माया ऐसी है कि यत्न करते-करते मर-
पच जानेपर भी जबतक आप दया नहीं करते, तबतक (मायासे) उद्धार नहीं
१. पाठान्तर—'अस'।