विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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था; किन्तु उनका कपटभाव होनेपर भी रामजी उन्हें अपनाये ही रह गये—
छोड़ा नहीं। दूसरी बात यह कि यदि श्रीरामजी 'भरतजीकी प्रशंसा करते
रहते हैं', तो इसमें रामजीकी कौन-सी विशेषता है ? क्योंकि भरतजी तो प्रशंसा
योग्य थे ही। अतः वियोगी हरिजीका अर्थ गोस्वामीजीके भावके सर्वथा विरुद्ध
और असंगत है। रामजी अपने प्रिय भाई भरतकी प्रशंसा नहीं करते बल्कि
भरत-सभामें भरतजीसे सुग्रीव और विभीषणकी प्रशंसा करते हैं। यहाँ ग्रन्थ-
कारका यही भाव है। देखिये न, गोस्वामीजीने रामायणमें लिखा भी है:—
जेहि अव बधेउ व्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥
ते भरतहिं भेंटत सनमाने। राजसभा रघुवीर बखाने ॥
( १०१ )
जाउँ कहाँ तजि चरन तिहारे ।
काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥१॥
कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे ।
खग, मृग, व्याध, पषान, विटप जड़, जवन कवन सुर तारे ॥२॥
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया विबस बिचारे ।
तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥३॥
शब्दार्थ—कौने = किस । बराइ = चुनकर । कवन = किस ।
भावार्थ—हे नाथ ! मैं आपके चरणोंको छोड़कर कहा जाऊँ ? संसारमें
‘पतित-पावन' नाम किसका है ? दीनजन किसे बहुत प्यारे हैं ? ॥१॥ किस
देवताने अपने ब्रानेकी लाज रखनेके लिए जबर्दस्ती कर करके अधमोंको चुनकर
उनका उद्धार किया है ? पक्षी (जटायु), मृग (मारीच), व्याध (वाल्मीकि),
पाषाण (अहल्या), जड़वृक्ष (यमलार्जुन) और यवनको किस देवताने तारा ?
॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग और मनुष्य ये सब बेचारे मायाके अधीन हैं।
अब हे प्रभो ! यह तुलसीदास अपनेको उन लोगोंके हाथोंमें क्यों सौंपे, अपना
स्वाभिमान क्यों खो दे ॥३॥