विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ विनय-पत्रिका
प्रेम-प्रसंसा-विनय-व्यंगजुत, सुनि बिधि की वरबानी।
तुलसी मुदित महेस मनहि मन, जगत-मातु मुसुकानी ॥५॥
शब्दार्थ—बावरो = बावला, पागल। रावरो = आपके। नाह = स्वामी। सिहानी =
सिहाती हैं। नाक=स्वर्ग। नकवानी = नाकों दम। भानी (यह भणित शब्दका अपभ्रंश है) =
कहा है।
भावार्थ—(शिवजीकी अत्यधिक उदारता देखकर पार्वतीके पास जाकर
ब्रह्मा कहने लगे) हे भवानी ! आपके पति पागल हैं। वह ऐसे दानी हैं कि
जिन्होंने कभी कुछ भी नहीं दिया है, उन्हें भी वे प्रतिदिन दिया करते हैं;
(तारीफ तो यह है कि) उनकी यह बड़ाई वेदने कही है ॥१॥ आप परम सयानी
हैं, जरा अपने घरकी घरेलू बातको देखिये (देते-देते अपना घर खाली करते जा
रहे हैं)। शिवकी दी हुई सम्पत्तिको देखकर लक्ष्मी और सरस्वती भी सिहा रही
हैं॥२॥ जिन लोगोंके ललाटमें मैंने सुखका नाम-निशानतक नहीं लिखा था, उन
कंगालोंके लिए स्वर्गकी सजावट करते-करते मेरे नाकोंदम आ गया है ॥३॥
दुखियोंके दुःख और दीनता भी दुखी है; याचकता व्याकुल हो गयी है (क्योंकि
अब दुःख, दीनता और याचकताको कहीं भी रहनेके लिए ठौर नहीं है)। यह
अधिकार किसी दूसरेको सौंप दीजिये; (मैं इसे नहीं ले सकता) मैं समझ गया कि
इस पदका अधिकारी होनेकी अपेक्षा भीख अच्छी है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं
कि प्रेम, प्रशंसा, विनय और व्यंग्य-भरी ब्रह्माकी सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी
मन् ही मन् प्रसन्न हो उठे और जगज्जननी पार्वतीजी मुसकराने लगीं ॥५॥
विशेष
१—इस पदमें 'ब्याज-स्तुति' अलंकार है। जहाँ सीधे अर्थको छोड़कर
घुमाव-फिरावसे दूसरा भाव प्रकट किया जाता है, वहाँ ब्याज या व्यंग्य होता
है। निन्दामें स्तुति प्रकट करनेको ब्याज-स्तुति कहते हैं और स्तुतिमें निन्दाका
भाव प्रकट करनेको ब्याज-निन्दा कहते हैं। ये ही इस अलंकारके दो भेद हैं।
ब्याज-स्तुतिका उदाहरण सामने है। ब्याज-निन्दा अलंकारका भी एक उदाहरण
ले लीजिये—
नीक दीन हरि सुन्दरताई।
—रामचरितमानस