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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 109

९८ विनय-पत्रिका
सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकन, हार,
किंकिनी-रटनि कटि-तट रसालं ।
वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं
कनक-मृदुवल्लिवत तरु तमालं ॥ ६ ॥
आजानु भुजदंड, कोदंड-मंडित वाम
बाहु, दच्छिन पानि वानमेकं ।
अखिलमुनि-निकर, सुर, सिद्ध, गंधर्व वर
नमत नर-नाग अवनिप अनेकं ॥ ७ ॥
अनघ, अविच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वैस, खलु
सर्वतोभद्र-दाताऽस्माकं ।
प्रनतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुन
नौमि श्रीराम सौमित्रि साकं ॥ ८ ॥
युगल पदपद्म सुखसद्म पद्मालयं
चिह्न कुलिसादि सोभाति भारी ।
हनुमंत-हृदि विमल कृत परम मंदिर, सदा
दास तुलसी-सरन सोकहारी ॥ ९ ॥
शब्दार्थ—आनंदकंदाकरं = (आनंद+कंद+आकरं) आनन्दके मेघोंकी खानि । रामा-
भिराम = लक्ष्मीको सुख देनेवाले । कौशेय = रेशमी । हाटक = सुवर्ण । वक्र = टेढ़ी, तिरछी ।
द्विज = दाँत । वज्र = हीरा । अधर = ओठ । मुखर = शब्दायमान । कुर्वंति = करते हैं ।
केयूर = अंगद, विजयठ । किंकिनी = करधनी । वल्लिवत = लताके समान । पानि = हाथ ।
अवनिप = राजा । खलु = निश्चयपूर्वक । विच्छेद = नाश । साकं = समेत । सद्म = घर ।
पद्मालय = लक्ष्मीका निवासस्थान ।
भावार्थ—हे देव ! आप जानकीनाथ, रघुनाथ, राग-द्वेषादि-रूपी अन्धकार-
का नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजके धाम हैं । आप सत्-
चित्-आनन्दस्वरूप आनन्दके मेघोंकी खानि, संसारके विश्राम-स्थल तथा सुखदायी
राम हैं ॥१॥ आप नवीन नीले मेघके समान सुन्दर कान्तिवाले, कमरमें श्रेष्ठ
वस्त्र रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाले हैं । आपके मस्तकपर सैकड़ों सूर्यके समान
प्रकाश करनेवाला रत्नजटित सोनेका मुकुट सुशोभित हो रहा है ॥२॥ आपके