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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 105

अरुन राजीव दल-नयन, सुषमा-अयन,
स्याम तन-कांति वर वारिदाभं।
तप्त कांचन-वस्त्र, सस्त्र-विद्या-निपुन,
सिद्ध-सुर-सेव्य, पाथोजनाभं ॥२॥
अखिल लावन्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम
प्रौढ़, गुनगूढ़, महिमा उदारं।
दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, स्वर्ग-अपवर्ग-पति
भग्न संसार-पादप-कुठारं ॥३॥
सापदस मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित,
जग्य-रच्छन-दच्छ पच्छकर्ता।
जनक-नृप-सदसि सिवचाप-भंजन, उग्र
भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥४॥
गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य,
त्यक्त श्री सहित सौमित्रि-भ्राता।
संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज,
दुष्ट-बध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥५॥
दंडाकारन्य कृतपुन्य पावन चरन,
हरन मारीच-मायाकुरंगं।
बालि बलमत्त गजराज इव केसरी,
सुहृद-सुग्रीव-दुख-रासि-भंगं ॥६॥
ऋच्छ, मर्कट विकट सुभट उद्भट समर,
सैल-संकास रिपु त्रासकारी।
बद्धपाथोधि सुर-निकर-मोचन, सकुल
दलन दससीस-भुजवीस मारी ॥७॥
दुष्ट विबुधारि-संघात, अपहरन महि-
भार, अवतार कारन अनूपं।
अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुन, सगुन,
ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥८॥