विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 493 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७० )
भाषा
जिस राजा के खड्ग के तीक्ष्ण और अथाह धारा जल में समुद्र में इन्द्र के
वज्र के भय से खूब नीचे डुबकी लगाकर छिपे हुवे पर्वतों के समान अन्य
राजाओं के कुटुम्बों के निमग्न अर्थात् नष्ट हो जाने पर भी धारा नगरी के
दुर्भाग्य से वह खड्ग एव छोटे धारा प्रवाह के समान मालवा के राजा भोज
की राजधानी धारा नगरी को न छोड़ सका । अर्थात् अनेक बड़े २ राजाओं
को जीत लेने पर भी छोटी सी धारा नगरी को जीतने से वह अपने को न
रोक सका ।
निःशेषनिर्वासितराजहंसः खड्गेन बालाम्बुदमेचकेन ।
भोजक्ष्माभृद्भुजपञ्जरेऽपि यः कीर्तिहंसीं विरसीचकार ॥६३॥
अन्वयः
बालाम्बुदमेचकेन खड्गेन निःशेषनिर्वासितराजहंसः यः भोजक्ष्मा-
भृद्भुजपञ्जरे अपि कीर्तिहंसीं विरसीचकार ।
व्याख्या
बालाम्बुद नूतनमेघो कृष्णवर्णमेघस्तद्वन्मेचकेन श्यामेन खड्गेन कृपाणेन
निशेष यथा स्यात्तथा निर्वासिता स्वनिवासाद्बहि कृता राजहंसा राजानो हंसा
इवेति राजहंसा राजश्रेष्ठा पक्षे मानस प्रापिता राजहंसपक्षिणो येन स । य
आहवमल्लदेवो नाम राजा भोजनामा क्ष्माभृद्राजा तस्य भुज पञ्जर इव तस्मिन्
सर्वसुखसामग्रीनिधानेऽपि कीर्तिरूपिणीं हंसीं पतिवियोगाद्विरसीचकार दुःखसागर-
निमग्नां चकार । भोजराज कीर्तिरपि निराधारा सती दुःखिता जाता । वर्षा
काले मानसं यान्ति हंसा इति प्रसिद्धयनुरोधान्मेघान्विलोक्य हंसा स्वस्थानं
त्यजन्ति मानसाञ्च गच्छन्ति । बालाम्बुदेन खड्गस्य सादृश्यादुपमा । राजसु
राजहंसपक्षिणामभेदारोपात्कीर्तौ हंस्या अभेदारोपाद्भोजराजभुजे पञ्जराभेदा-
रोपाच्च सावयवरूपकम् ।
भाषा
जिसने नवीन मेघ के समान कृष्णवर्ण खड्ग से समस्त राजारूपी राजहंसों
को भगा दिया था (मेघों को देखकर हंसपक्षी मानस सरोवर चले जाते हैं ऐसी
प्रसिद्धि है) उसने भोजराजा के भुजारूपी पिंजड़े में सुरक्षित उसकी कीर्तिरुपी