विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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भाषा
लङ्का के पास के समुद्र में से उत्पन्न यह लक्ष्मी, राक्षसी के समान रक्त
रूपी सुरा से तृप्त होती है। परन्तु यह तुम्हारे भुजदण्ड से बँध जाने पर
विनम्र हो जाएगी। अर्थात् लङ्का में उत्पन्न राक्षसी जिस प्रकार रक्त पान
कर तृप्त होती है वैसे ही यह लङ्का के समीपवर्ती समुद्र से उत्पन्न होने वाली
लक्ष्मी रक्त प्रवाह् से तृप्त होती है। यह लक्ष्मी तुम्हारे भुजाओ के दण्ड
से दण्डित होकर या तुम्हारी भुजा के आश्रय मे आने पर भविष्य में नम्र
हो जाएगी।
जानामि मार्गं भवतोपदिष्टं ममापि चालुक्यकुले प्रसूतिः ।
किन्त्वत्र लक्ष्मीर्गुणबन्धहीने निसर्गलोला कथमेति दार्ढ्यम् ॥४८॥
अन्वयः
भवता उपदिष्टं मार्गं जानामि । (यतः)मम अपि चालुक्यकुले प्रसूतिः ।
किन्तु गुणबन्धहीने अत्र निसर्गलोला लक्ष्मीः कथं दार्ढ्यम् एति ।
व्याख्या
भवतोपदिष्टं कथितं मार्गं नयवर्त्म जानामि वेद्मि । यतो ममापि चालु-
क्यवंशे नीतिमार्गावलम्बिनि चालुक्यनृपाणां कुले प्रसूतिरुत्पत्तिः । अहमपि
त्वत्सदृशो नीतिमार्गकुशले चालुक्यवंशे जात इति त्वदुक्तं सर्वं नयवर्त्म
जानामीतिभावः । किन्तु परन्तु गुणानां शौर्यादीनां पक्षे रज्जूनां बन्धः संघः पक्षे
ग्रन्थिस्तेन हीने रहितेऽत्र अस्मिन् ज्येष्ठे पुत्रे सोमदेवे निसर्गात्स्वभावादेव
लोला चञ्चलाऽस्थिरा लक्ष्मी राज्यश्रीः कथं केन प्रकारेण दार्ढ्यं दृढ़तां
स्थिरतामित्यर्थः । एति प्राप्नोति समुपयास्यतीति भावः । दृढ़बन्धनेन बद्ध
एव पदार्थो निश्चलो भवतीति नियमः ।
भाषा
तुमने जो नीतिमार्ग दिखाया है उसे मैं भी जानता हूँ। क्यो कि मेरा भी
जन्म नीति कुशल चालुक्य राजाओ के वंश में ही हुआ है। परन्तु शौर्यादिगुणो
के संघ से रहित अथवा बंधन योग्य ग्रन्थियुक्त रस्सी से रहित मेरे ज्येष्ठपुत्र
सोमदेव के युवराज पद पर बैठने पर यह स्वभावत चञ्चला राज्यलक्ष्मी इससे