विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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की वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। ऊपर उद्धृत 'सितासितौ' प्रभृति वीरावली शास्त्र के वचन
का यही तात्पर्य है।
जयरथ द्वारा उद्धृत 'सहौ क्षपादि' इत्यादि वचन के 'वीर्यं मुक्त्वाऽस्वरं महत्' इस
अन्तिम चरण में आये अस्वर पद से कुछ लोग विभाग रहित पश्यन्ती दशा का ग्रहण करते
हैं। जैसा कि वामननाथ ने कहा है—
अप्राणमस्वरं ध्यात्वा पश्यन्त्या निर्विभा गया ।
चिन्मात्रस्पर्शयोगेन विलीनः स्यात् परे पदे ॥
इस श्लोक को "अबिन्दुमविसर्गं च" (श्लो० ८८) की व्याख्या करते समय पहले उद्धृत किया
गया है और वहीं अकार की विभाग रहित पश्यन्ती दशा का भी विवरण दिया गया है।
वामननाथ के इस प्रतिपादन का भी आधारभूत वचन यह है—
^1ततोऽस्वरोऽर्कसोमाग्निकलाबीजप्रसूतिभाक् ।
उदेत्येकः समालोकः प्रमाणार्थप्रमातृगः ॥
अर्थात् तब सूर्य, सोम और अग्नि की कलाओं के बीज को अंकुरित करने वाला अस्वर रूपी
प्रकाश उदित होता है, जो कि प्रमाण, प्रमेय और प्रमाता इन सबको प्रकाशित कर देता है ।
“अर्थः प्रमेयम्” ^2 इस क्रमस्तोत्र के प्रमाण पर इस श्लोक में अर्थ शब्द से प्रमेय का ग्रहण
किया जाता है।
इस 'अस्वर' (अनुत्तर) अवस्था की प्राप्ति के लिये देश, काल और आकार के भेदों
को मिटा देने वाली परा देवी का सहारा लेना चाहिये । इसी को निरावरण भगवती प्रज्ञा
॰पारमिता कहा जाता है। जैसे कि—
निष्प्रपञ्चा निराभासा निर्विकल्पा निरामया ।
निःस्वभावा परा सूक्ष्मा बिन्दुनादविवर्जिता ॥
प्रज्ञापारमिताऽपारा सर्वबुद्धोदया परा ।
अर्थात् प्रज्ञा पारमिता का स्वरूप निष्प्रपंच, निराभास, निर्विकल्प, निरामय, निःस्वभाव, परम
सूक्ष्म, बिन्दु और नाद से रहित है। यह सीमातीत है ओर सभी तरह की बुद्ध दशाओं के
उदय का सर्वोत्कृष्ट कारण है। प्रज्ञा पारमिता स्वरूप शून्य भूमि का ही इस विज्ञानभैरव
तन्त्र में परम शिव ने परा शक्ति के रूप में सर्वत्र उपदेश किया है। बौद्ध दर्शन में इस शून्य-
भूमि को ही मोक्ष मान लिया गया है, किन्तु यह ध्यान देने की बात है कि भावनाओं के
आधार पर जो साक्षात्कार होता है, वह शैव शास्त्र में माया के गर्भ में घूमते रहने का ही
साधन बन पाता है, अर्थात् इससे परम पद की प्राप्ति नहीं हो पाती ॥ १५१ ॥
- ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ७१) में यह श्लोक सिद्धपाद का बताया
गया है। तन्त्रालोकविवेक (आ० ३, भा० २, पृ० ७९) में भी यह वचन उद्धृत है। - यह वचन शिवोपाध्याय की टीका के सिवाय अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।