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सर्वकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१२६ : विज्ञानभैरव
का ही स्वरूप मान कर मन को वहीं स्थिर कर दे । इस प्रकार के अभ्यास के स्थिर हो जाने
पर अन्ततः मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है ॥११३॥
[ धारणा-९१ ]
¹यत्र¹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः२ ।
तस्य तन्मात्र³धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरितात्मता४ ॥११४॥
यत्र यत्र नीलसुखादौ, अक्षमार्गेण चक्षुरादिसुषिरमार्गेण, विभोः प्रभोः पर-
भैरवात्मनः, चैतन्यं चित्प्रकाशः, अभिव्यज्यते स्फुरति, तस्य नीलसुखादेः, तन्मात्र-
धर्मित्वात् दर्पणप्रतिबिम्बिताभासवैचित्र्येण चैतन्यमात्रस्वभावत्वात्, चिल्लयात् चितौ
लयाद् विश्रान्तेः, भरितात्मता परभैरवस्वरूपता । भावनाया अस्या दाढर्येन भावकः
‘अहमेव विश्वमयो महच्चैतन्यभरितः’ इत्यनुभूततात्त्विकावस्थः संपद्यत इति भावः ।
यथा घनीभूतः प्रकाश एव सूर्यमण्डलं जातम्, तथा चिदेव हि आश्यानीभूता जगदा-
त्मना भातीत्याम्नायः ॥११४॥
जहाँ जहाँ नील, सुख प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर भावों में चक्षु प्रभृति बाह्य अथवा
आन्तर इन्द्रियों के माध्यम से प्रभु परभैरव स्वरूप आत्मा का चित्प्रकाश अभिव्यक्त होता है,
वहाँ वहाँ उन नील, सुख आदि भावों को केवल चित्प्रकाशात्मक ही मानना चाहिये। यदि
इनको चैतन्य से अतिरिक्त माना जाय तो इनकी चेत्यता अर्थात् ज्ञानविषयता भी नहीं बन
सकेगी, ये ज्ञान के विषय भी न हो सकेंगे । दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहे नाना प्रकार के
आभास जैसे दर्पणमात्र स्वभाव हैं, दर्पण के अतिरिक्त इनकी कोई सत्ता नहीं है, दर्पण के
कारण ही इनकी प्रतीति होती है; उसी तरह से प्रकाशात्मक शिव में स्थित चैतन्यमात्र
स्वभाव ही यह सारा जगत् है, प्रकाशात्मक चैतन्य के अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है,
चैतन्य के कारण ही यह भासित हो रहा है। इस धारणा का अभ्यास करने से यह भावना
दृढ़ हो जाती है कि उस विभु के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है। ऐसा विचार करते-करते
साधक इस सारे विश्व की भित्तिभूत ( आधारस्वरूप ) चिति में लीन हो जाता है और
उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है, उसको अपनी तात्त्विक पूर्णता का बोध हो
जाता है कि अखण्ड चैतन्य से ओतप्रोत यह सारा विश्व मैं ही हूँ। जैसे घनीभूत प्रकाश ही
सूर्यमण्डल कहलाता है, उसी तरह से यह घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् के रूप में भासित
होने लगती है। आगमशास्त्र की यह प्रमुख मान्यता है। इसका अभिप्राय यह है कि जैसे
१. तत्र तत्रा°-यो० । २. प्रभोः-यो० । ३. °रूपत्वा°-यो० । ४. स्थितिः-यो०,
मतिः-यो० ।

  1. तन्त्रालोकवि० ( भा० ११, आ० २९, पृ० ८२ ), शिव० विम० (पृ० ४२), योगिनी०
    दीपिका (पृ० १९२, २६४, २९९, ३३३. ३४३) में यह उपलब्ध है। तन्त्रालोकविवेक
    (भा० १, आ० १, पृ० २१) में ऐसा पाठ मिलता है—"येन येनाक्षमार्गेण यो योऽर्थः
    प्रतिभासते । स्वावष्टम्भबलाद् योगी तद्गतस्तन्मयो भवेत् ॥"