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सर्वकोश
विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 172 में से

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पृष्ठ 60

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विदुरनीति

जिसकी प्रसन्नताका कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती—जैसे स्त्री नपुंसकको पति नहीं बनाना चाहती ॥ २१ ॥

कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान् ।
क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान् ॥ २२ ॥

जिनका मूल ( साधन ) छोटा और फल महान् हो, बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्भ कर देता है, वैसे कामोंमें वह विघ्न नहीं आने देता ॥ २२ ॥

ऋजु पश्यति यः सर्वं चक्षुषानुपिबन्निव ।
आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः ॥ २३ ॥

जो राजा मानो आँखोंसे पी जायगा—इस प्रकार प्रेमके साथ कोमल दृष्टिसे देखता है, वह चुपचाप बैठा रहे तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है ॥ २३ ॥

सुपुष्पितः स्यादफलः फलितः स्याद् दुरारुहः ।
अपक्वः पक्वसंकाशो न तु शीर्येत कर्हिचित् ॥ २४ ॥

राजा वृक्षकी भाँति अच्छी तरह फूलने ( प्रसन्न रहने ) पर भी फलसे खाली रहे ( अधिक देनेवाला न हो ) यदि फलसे युक्त ( देनेवाला ) हो तो भी जिसपर चढ़ा न जा सके, ऐसा ( पहुँचके बाहर ) होकर रहे। कच्चा ( कम शक्तिवाला ) होनेपर भी पके ( शक्तिसम्पन्न ) की भाँति अपनेको प्रकट करे। ऐसा करनेसे वह नष्ट नहीं होता ॥ २४ ॥

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् ।
प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति ॥ २५ ॥