वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ वेणीसंहारं नाटकं
सुन्दरकः—तदो अ देव, अदिक्कन्ते सरवरिसे क्खणमेत्तं सिंहणादे
पण्डववले विमुक्काक्कन्दे कोरवबले उत्थिदो महन्तो कलअलो हा हदो
कुमालविससेणा हा हदो त्ति । ( ततश्च देव, अतिक्रान्ते शरवर्षे क्षणमात्रं ससिं-
हनादे पाण्डवबले विमुक्ताक्रन्दे कौरवबल उत्थितो महान् कलकलो हा हतः कुमार-
वृषसेनो हा हत इति । )
दुर्योधनः—( सवाष्पावरोधम् ) ततस्ततः ।
सुन्दरकः—तदो देव, महन्तीए वेलाए पेक्खिअ हदसारहितुरङ्गं
लूणादवत्तकेदुवंसं सगाप्पब्भट्टं विअ सुलकुमालं एक्केण उज्जेव मम्म-
भेदिणा सिलीमुहेण भिण्णभदेहं रहमज्झे परिट्ठिदं कुमालं आअदो । ( ततो
देव, महत्या वेलया प्रेक्ष्य हतसारथितुरङ्गं लूनातपत्रकेतुवंशं स्वर्गप्रभ्रष्टमिव सुरकुमार-
मेकेनैव मर्मभेदिना शिलीमुखेन भिन्नदेहं रथमध्ये परिस्थितं कुमारमागतः । )
दुर्योधनः—( सास्रम् । ) अहह कुमारवृषसेन, अलमतः परं श्रुत्वा ।
हा वत्स वृषसेन, हा मदङ्कदुर्ललित, हा गदायुद्धप्रिय, हा राधेयकुलप्ररोह,
ससिंहनादे, पाण्डवबले, सतीत्यन्वयः । विमुक्ताक्रन्दे, कौरवबले सतीत्यन्वयः ।
वेलया = समयेन, अस्य प्रेक्ष्येत्यनेनान्वयः सुरकुमारं = देवपुत्रम्, इव, शिली-
मुखेन = बाणेन, कुमारं = वृषसेनम्, प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा, आगतोऽहमित्यन्वयः ।
वृषसेनवधश्रवणाद् विलपति दुर्योधनः— अहहेति । मदङ्कदुर्ललित = मम अङ्के
क्रोडे दुर्ललितः यः, तत्सम्बोधने, कृच्छ्रविलासिर इत्यर्थः ।
सुन्दरक—इसके अनन्तर महाराज बाणवर्षा के समाप्त होने पर क्षणभर में ही सिंह-
गर्जन करती हुई पाण्डव-सेना में और रोती हुई कौरव सेना में 'हाय ! कुमार वृषसेन
मारा गया, हाय मारा गया' इस प्रकार का महान् कलकल होने लगा ।
दुर्योधन—( अश्रु रोककर ) तो फिर क्या हुआ ?
सुन्दरक—तो फिर महाराज ! कुमार के घोड़े और सारथी मरे हुए पड़े थे । उनके
ध्वजा और छाते का दण्ड खण्डित कर दिया गया था । वे स्वर्गच्युत देवकुमार की भाँति
एक ही मर्मभेदी बाण से जर्जरित कलेवर होकर रथ के बीच में बैठे हुए थे । बहुत देर
तक मैं वहाँ उसे देखकर चला आया ।
दुर्योधन—( आँसू भरकर ) हाय ! कुमार वृषसेन, इसके बाद सुनने की
आवश्यकता नहीं । हाय बेटा वृषसेन ! हाय मेरी गोदी के प्यारे ! हाय गदायुद्ध के