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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१
च्यवन उवाच
(प्रह्लादके वचनको सुनकर) च्यवनजीने कहा -
पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्।
महाबाहो ! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर,
चक्रतीर्थं महाबाहो रसातले विदुः ॥ ३७
और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥ ३७ ॥
पुलस्त्य उवाच
पुलस्त्यजीने कहा - महामुने ! भार्गवकी इसी
श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने।
बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके
नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८
लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥
प्रह्लाद उवाच
प्रह्लाद बोले-उठो, हम सभी नैमिष-
उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् ।
तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं
कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत (विष्णु)-के
द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९
दर्शन करेंगे ॥ ३९ ॥
पुलस्त्य उवाच
पुलस्त्यजीने कहा - दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर
इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः।
वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं
चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४०
अतुलनीय उद्योगमें लग गये। उन महाबलवान्
ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः।
दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक
स्नान किया। इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया
नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१
(आखेट या शिकार)-के लिये वनमें घूमने लगे।
ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह।
वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली
सरस्वती नदीको देखा। वहीं समीप ही बाणोंसे
चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२
खचाखच बिंधे बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले एक शाल
तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् ।
वृक्षको देखा। वे सभी बाण एक-दूसरेके मुखसे लगे
ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३
हुए थे ॥ ४०-४३ ॥
ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् ।
तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत (साँपोंसे
दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४
लिपटे) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ।
स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी।
फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए
बड़ी-बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको
समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५
देखा। उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव
तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते ।
नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े-बड़े
शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६
तरकस वर्तमान थे। उन दोनोंको इस प्रकार देखकर
तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः।
दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा। फिर
ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७
उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४-४७ ॥
किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् ।
आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों
क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८
कर रहे हैं ? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार,
कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र ? इसपर नरने उनसे कहा -
अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर ।
दैत्येश्वर ! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो ? सामर्थ्य
सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४९
रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही