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सर्वकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 141

अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १३१
यस्तु संचिन्त्यमानोऽपि सर्वं पापं व्यपोहति।
नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेधसे ॥ २६
ये पश्यन्त्यखिलाधारमीशानमजमव्ययम्।
न पुनर्जन्ममरणं प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७
यो यज्ञो यज्ञपरमौरिज्यते यज्ञसंस्थितः।
तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८
गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्विदां गतिः।
यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २९
यतो विश्वं समुद्भूतं यस्मिन् प्रलयमेष्यति ।
विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ॥ ३०
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं व्याप्तं येन चराचरम्।
मायाजालसमुन्नद्धं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३१
योऽत्र तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः।
विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२
मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः।
रात्रिंजं सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३
यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्।
पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४
यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्।
नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ॥ ३५
यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनार्दन ।
सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६
स्मरण करनेवालेके सारे पाप नष्ट कर देते हैं, उन
विशुद्ध हरिमेधाको मेरा नमस्कार है। जो प्राणी अविनाशी
भगवान्‌को अखिलाधार, ईशान एवं अजके रूपमें देखते
हैं, वे कभी भी जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते । प्रभो !
मैं आपको प्रणाम करती हूँ। आपकी आराधना यज्ञोंद्वारा
होती है, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, यज्ञमें आपकी स्थिति है;
यज्ञपुरुष ! आप ईश्वर, प्रभु विष्णुको मैं नमस्कार करती
हूँ ॥ २५-२८ ॥
वेदोंमें आपका गुणगान हुआ है - इसे वेदज्ञ गाते
हैं। आप विद्वज्जनोंके आश्रय हैं, वेदोंसे
जानने योग्य एवं नित्यस्वरूप हैं; आप विष्णुको मेरा
नमस्कार है। विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है और जिनमें
विलीन होगा तथा जो विश्वके उद्भव एवं प्रतिष्ठाके
स्वरूप हैं, उन महान् आत्मा (परमात्मा)-को मेरा
नमस्कार है। जिनके द्वारा मायाजालसे बँधा हुआ
ब्रह्मासे लेकर चराचर (विश्व) व्याप्त है, उन उपेन्द्र-
भगवान्‌को मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जल-
स्वरूपमें स्थित होकर अखिल विश्वका भरण करते
हैं, उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णुको मैं नमस्कार
करती हूँ ॥ २९-३२ ॥
जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रिसे उत्पन्न,
रूपधारी तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम
करती हूँ। जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा-रूप दोनों आँखें
समस्त लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंको सतत देखती रहती
हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके
विषयमें मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है- असत्य नहीं
है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्रष्टा विष्णुको मैं नमस्कार
करती हूँ। हे जनार्दन ! यदि मैंने यह सत्य कहा है तो
उस सत्यके प्रभावसे मेरे मनकी सारी अभिलाषाएँ
परिपूर्ण हों ॥ ३३-३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २७ ॥